धर्मान्ध उच्च शिक्षित होकर भी आतंकका मार्ग सहज ही चुनते हैं और अपने तथाकथित धर्मके नामपर हिंसा करते हैं, निर्दोषोंककी हत्या करते है और हंसते-हंसते मूर्खों समान अपने प्राण गंवा देते हैं और अन्य धर्मान्ध उन्हें ‘हुतात्मा’ समझते हैं ! इससे दो बातें समझमें आती है एक तो कि वे चाहे जितने भी उच्च शिक्षित हों उनके लिए धर्मका सर्वाधिक महत्त्व होता है । उनके धर्मगुरु, उन्हें धर्मकी घुट्टी बाल्यकालसे मदरसा और मस्जिदमें पिलाते हैं, वहीं हिन्दुओंको सामान्य धर्मशिक्षा भी देनेमें यहांकी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्था असफल रही हैं, अन्यथा हिन्दू बहुल देशमें इतने धर्मांध आतंकवादी कैसे जन्म लेते और अधिकांश हिन्दू धर्मशिक्षणविरहित क्यों रहता ? वह धर्मान्तरित क्यों होता ? वह अपनेको गर्वसे धर्मनिरपेक्ष क्यों कहता ? वह हिन्दू धर्मद्रोही क्यों बनता ?
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