धर्मधारा


लोकतन्त्रका और वीभत्स स्वरुप तब देखनेको मिलता है जब राजनीतिक दलके कार्यकर्ताओंकी लोक सभा या विधान सभा हेतु प्रत्याशीकी सूची घोषित होती है ।
अपने ही नेतृत्वके विरुद्ध या दलके विरुद्ध ये स्वार्थलोलुप एवं सत्तालोलुप नेता अपना विरोध जताना आरम्भ कर देते हैं । जो अपने दलका नहीं होता, वह समाज और राष्ट्रका क्या होगा ? ऐसे  सत्तालोलुप नेताओंसे क्या कभी समाज और राष्ट्रका उत्थान सम्भव है ? सत्तामें रहे बिना भी राष्ट्र और समाजकी सेवा की जा सकती हैं, यह सामान्यसा तथ्य आजके राजनितिक दल अपने कार्यकर्ता नहीं सिखा पाते हैं, वे राजधर्मका पालन क्या कभी कर सकते हैं ?  



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