नास्तिक तथाकथित बुद्धिजीवियोंको शासन दण्ड दे !


इस देशमें अनेक नास्तिक प्रवृत्तिके तथाकथित बुद्धिजीवी स्वयंको पण्डित कहते हैं, कुछ तो भगवा वस्त्र पहनकर स्वयं घोषित स्वामी कहलाने लगते हैं, वस्तुतः ऐसे लोग ज्ञानी कहलानेके अधिकारी नहीं होते हैं; क्योंकि ज्ञानियोंके शुभ लक्षणोंके विषयमें शास्त्र कहता है –
निषेवते प्रशस्तानी निन्दितानी न सेवते ।
अनास्तिकः श्रद्धान एतत् पण्डितलक्षणम् ॥

अर्थ : सद्गुण, शुभ कर्म, भगवानके प्रति श्रद्धा और विश्वास, यज्ञ, दान, जनकल्याण आदि, ये सब ज्ञानीजनके शुभ-लक्षण होते हैं ।
जो ईश्वरके अस्तित्त्वको मानता और अपने वक्तव्योंसे समाजको दिशाभ्रमित करता है, राष्ट्रद्रोहकी भावना समाजमें अंकित करता है, ऐसे लोग ज्ञानी नहीं समाज कण्टक और महापापी होते हैं ! ऐसे लोगोंके साथ शासनने समय रहते ही दण्ड देना चाहिए, अन्यथा समाज उनके विरुद्ध विद्रोहका बिगुल फूंकने लगता है और इस तथ्यकी पुष्टि सम्पूर्ण विश्वका इतिहास करता है ।



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