वैलेंटाइन डे मानना अर्थात् हमारी दैवी वैदिक संस्कृतिको है कलंकित करना !


no valentine day

अ. स्वैराचारको प्रोत्साहन देनेवाली एक कुप्रथा है वैलेंटाइन डे (१४ फरवरी) मनाना

वैलेंटाइन डे पाश्चात्य संस्कृतिके अन्धे अनुकरणसे प्रेरित एक विकृत कुसंस्कार है, जिसकारण युवा पीढी अपनी नैतिकताको ताकमें रख, भोगवादकी ओर प्रवृत्त हो रही है । स्वैराचारको प्रोत्साहन देनेवाला यह दिवस, उच्छ्रंखलताका द्योतक बन, युवा वर्गको अपनी सभ्य एवं सुसंस्कृत वैदिक संस्कृतिकी मर्यादाको भंग करनेकी अनुचित प्रेरणा देता है । यथार्थमें वेलेंटाइन डे हिन्दू युवा पीढीका राष्ट्रान्तरण और धर्मान्तरण करनेवाला एक अशुभ दिवस है । वैलेंटाईन डे मनाना अर्थात्, पश्चिमी संस्कृतिकी अनैतिकताका अनुसरण व हिन्दू संस्कृतिका अवमूल्यन करना है । इससे हिन्दुओंके एक दिनके राष्ट्रान्तरण एवं धर्मान्तरणको प्रोत्साहन मिलता है ।

आ. वैलेंटाईन डेका इतिहास        

किसी भी सामाजिक उत्सवको उत्सव तभी कहा जा सकता है जब वह समन्वय, सामंजस्य, सुसंवाद या बन्धुत्वभाव (भाईचारा) बढानेवाला हो, उस देशकी मूल सांस्कृतिक परम्पराओंसे जुडनेकी क्षमता रखता हो, समरसताके भावको प्रोत्साहित करते हुए समाजके अधिकाधिक सदस्योंका उत्थान करनेवाला हो एवं समाजको आध्यात्मिक प्रगतिकी ओर उन्मुख करनेवाला हो, ‘वैलेंटाईन डे’, इनमेंसे एक भी मापदण्डपर सफल प्रतीत नहीं होता । इस दिवसका न ही कोई नैसर्गिक महत्त्व है और न ही कोई आध्यात्मिक महत्त्व है और हमारी संस्कृतिके परिपक्ष्यमें तो इसका कोई सामाजिक महत्त्व भी नहीं है, वह कैसे ? इसे समझने हेतु सर्वप्रथम इसका दिवसका संक्षेपमें इतिहास जान लेते हैं।

आ. १. पाश्चात्योंमें नहीं थी विवाह करनेकी प्रथा : पाश्चात्य सभ्यतामें न ही पूर्व कालमें विवाह जैसे कोई संस्थाका कोई विशेष महत्त्व था और न ही आज है । वहां स्त्री-पुरुष पशु समान एकत्रित आते हैं, अपनी वासनाकी तृप्ति करते हैं एवं इस माध्यमसे वहां सन्तानोत्पत्तिकी प्रक्रिया चलती आई है, यही वहांकी परम्परा और सभ्यता रही है । वहां ऐसा कोई पुरुष या महिला सम्भवत: मिले जिसका एक विवाह हुआ हो, जिनका अपने सम्पूर्ण जीवनमें एक पुरुष या एक स्त्रीसे सम्बन्ध रहा हो और यह भी उनकी सदियों पुरानी परम्परा है । भारतमें आजके निधर्मी, नव धनाड्य आधुनिक वर्गमें मतिभ्रम एवं बुद्धि भ्रष्टताके कारण भले ही “Live in Relationship” कुछ दशकोंसे प्रचलित हो गया हो, जिसमें लोक-लाजकी सारी मर्यादाओंको त्याग कर स्त्री-पुरुष व्यभिचार करते हैं और उस सम्बन्धको पति-पत्नीका सम्बन्ध बताते हैं; परन्तु पाश्चात्योंमें यह म्लेच्छ परम्परा तो उनकी संस्कृतिका अविभाज्य अंग रही है और आज भी अमरीकाके २४-३५% आयुके ७०% युवा अविवाहित हैं; क्योंकि वे अविवाहित रहना चाहते हैं और यूरोपके भी अधिकांश युवा विवाह नहीं करना चाहते हैं । इतना ही नहीं, अब तो वे सन्तानोंको भी जन्म नहीं देना चाहते हैं तभी तो सम्पूर्ण यूरोप और अमरीकी देश अपनी जनसंख्याको बढाने हेतु मुसलमान शरणार्थियोंको आमन्त्रित करता रहता है और उसके भयावह परिणाम भी उन्हें स्पष्ट रूपसे दिखाई देने लगे हैं ।

आ. २. पाश्चात्योंके लिए स्त्री मात्र भोगकी वस्तु : पाश्चात्य देशोंमें स्त्री और पुरुष दोनोंके ही अनेक व्यक्तियोंसे शारीरिक सम्बन्ध होते हैं इसीलिए भी वे विवाहके बन्धनमें बंधना नहीं चाहते हैं । स्वयं प्लेटो, एक यूरोपीय दार्शनिकका एक स्त्रीसे सम्बन्ध नहीं रहा है, उन्होंने लिखा है कि “मेरा २०-२२ स्त्रियोंसे सम्बन्ध रहा है” अरस्तू भी यही कहता है, देकातेर् भी यही कहता है और रूसोने तो अपनी आत्मकथामें लिखा है कि “एक स्त्रीके साथ रहना, ये तो कभी सम्भव ही नहीं हो सकता । “तो वहां एक पत्नीव्रत जैसा कोई धर्म नहीं है और महान कहे जाने वाले इन सभी दार्शनिकोंका कहना है कि “स्त्रीमें आत्मा ही नहीं होती” “स्त्री तो पटल और आसन्दी (मेज और कुर्सी) के समान हैं; अत: जब पुरानीसे मन भर गया तो नूतन ले आएं ।”

इ. वैलेंटाईन मात्र एक समाज सुधारक थे कोई सन्त नहीं

इसी पैशाचिक सभ्यतामें यूरोपमें कुछ ऐसे लोग निकले जिन्होंने इन बातोंका विरोध किया और इन रहन-सहनकी व्यवस्थाओंकी आलोचना की । उन कुछ लोगोंमेंसे एक ऐसे ही यूरोपियन व्यक्ति थे जिनका जन्म आजसे लगभग १५०० वर्ष हुआ था, उनका नाम था – वैलेंटाइन । उनका कहना था कि मनुष्य होकर भी पशु समान शारीरिक सम्बन्ध रखना अनुचित एवं घातक है, इससे मनुष्योंको जननेन्द्रियोंसे सम्बन्धित रोग होते हैं ।

उ. शारीरिक सम्बन्ध विवाहके पश्चात् बनाएं इसका उन्होंने प्रबोधन किया एवं अनेक विवाह करवाए :

वे विवाहके पक्षधर थे और वे विवाह पश्चात् शारीरिक सम्बन्ध बनाने हेतु रोममें घूम-घूम कर प्रसार करते थे और एक ही स्त्रीसे विवाह करनेको प्रोत्साहन देते थे । वे सभीको एक पत्नीके साथ रहनेके लिए एवं विवाह पश्चात् शारीरिक सम्बन्ध बनानेके लिए कहते थे । देखिए ! आजका हिन्दू समाज जिस सभ्यताका अनुकरण करनेमें गर्वकी अनुभूति करता है, उसका इतिहास एवं संस्कृति कितनी विकृत थी एवं वहां लोगोंको विवाह संस्थामें बंधने हेतु प्रबोधन करना पडता था । संयोगसे वे वेलेंटाइन महोदय गिरिजाघरके (चर्च के) पादरी हो गए और वहां आनेवाले प्रत्येक व्यक्तिको विवाह करनेके लिए प्रेरित करते थे, कुछ लोग उनसे पूछते थे कि ये अनर्गल बातें आपकी बुद्धिमें कैसे आने लगीं ? ये तो हमारे यूरोपमें कहीं नहीं है, तो वो कहते थे कि “आजकल मैं भारतीय सभ्यता एवं दशर्नका अध्ययन कर रहा हूं और मुझे लगता है कि उनकी जीवन शैली परिपूर्ण एवं समाजके सर्वांगीण उत्कर्ष हेतु पूरक है और इसीलिए मैं चाहता हूं कि आप लोग भी उसका पालन करें, ऐसेमें जो लोग उनकी बातको मानते थे, उनका विवाह, वे गिरिजाघरमें कराते थे और इसप्रकार उन्होंने एक-दो नहीं वरन् सैंकडों विवाह करवाए ।

ऊ. समाज सुधारक वैलेंटाईनको फांसीपर लटकाए जानेसे आरम्भ हुई इस दिवसको मनानेकी परम्परा

जिस समय वैलेंटाइन हुए, उस समय रोमका राजा था क्लौडियस । क्लौडियसको वैलेंटाइनकी विचारधारा खटकने लगी और उन्हें लगा कि इससे तो उनके आसुरी भोगमें अंकुश लग जाएगा और उनकी पैशाचिक संस्कृति नष्ट हो जाएगी; अतः उन्होंने वैलेंटाइनको बन्दी बना लिया और जब वैलेंटाइनने उनकी बातें अस्वीकार कर दी तब उन्हें १४ फरवरीके दिवस सार्वजनिक स्थानपर उनके अनुयायियोंके समक्ष फांसीपर लटका दिया गया । तो हिन्दुओ ! वैलेंटाइन न कोई सन्त थे न ही महापुरुष थे; अपितु वे एक सामाजिक कार्यकर्ता थे एवं लोगोंको विवाह करने हेतु प्रेरित करते थे और उनकी फांसी उपरान्त उनके अनुयायियोंने १४ फरवरीको ‘वैलेंटाइन डे’के रूपमें मनाना आरम्भ कर दिया ।

ए. बिना वैलेंटाईन डेका अर्थ जाने हिन्दू करते हैं इसका अनुसरण

अब यही ‘वैलेंटाइन डे’ भारतमें आ गया है जहां विवाह होना सामान्यसी बात है और आज भी यदि कुछ नीतिशून्य एवं बुद्धिभ्रष्ट अभिजात्य वर्गके लोगोंको छोड दें तो बिना विवाहके पति-पत्नी समान रहनेवाले जोडेको हमारे हिन्दू समाजमें हीन दृष्टिसे देखा जाता है । दुःख इस बातका है कि आज अनेक हिन्दू बिना कुछ जाने-बूझे ‘वैलेंटाइन डे’ मनाने लगे हैं । विदेशी संकेतों एवं धनोंसे संचालित हमारी प्रसार वाहिनियां (टीवी चैनल) इस कुसंस्कारको प्रसारित करनेमें आगमें घी डालने समान कार्य करती हैं और यह विकृति महामारी समान महानगरोंके साथ ही अब छोटे नगरोंमें भी फैलने लगी है । युवा होते युवक-युवतियां बिना सोचे-समझे एक दूसरेको ‘वैलेंटाइन डे’का शुभेच्छा पत्र (कार्ड) देते हैं, जिसमें लिखा होता है “Would You Be My Valentine” जिसका अर्थ है “क्या आप मुझसे विवाह करेंगे” । इसका अर्थ अधिकांश लोगोंको ज्ञात नहीं होनेके कारण अब वे इसे जिससे भी प्रेम करते हैं, सभीको इसे देते फिरते हैं चाहे वे उनके माता-पिता हो, दादा-दादी हों या चाचा-चाची हों ! अब आप समझ गए हम हिन्दुओंका बौद्धिक पतन किस सीमातक हो चुका है ?

ऐ. वैलेंटाईन डे मनानेके भयावह स्वरूपके दुष्परिणाम

पाश्चात्य देशोंमें यह निःसंकोच सार्वजनिक स्तरपर मनाया जाता है, वहांका सामाजिक ढांचा कहां पहुंच चुका है ?, यह जानना अति आवश्यक है ।

१. पाश्चात्योंमें भारत जैसे विवाह रूपी संस्कारको माननेकी परम्परा नहीं है । वहां विवाहको अधिकांशत: भोग आधारित संविदा (समझौता) माना जाता है । इसलिए वहां अन्ततोगत्वा जब किसी व्यक्तिके स्वार्थकी पूर्ति नहीं होती है, तो उसका परिणाम विवाह विच्छेदमें हो जाता है ।

एक अमरीकी शोध अनुसार विश्वमें ‘वैलेंटाईन डे’के दिनोंमें, न्यायालयमें प्रविष्ट होनेवाले विवाह-विच्छेदके अभियोगोंमें ४०% तककी वृद्धि होती है । इससे यह ज्ञात हो गया होगा कि प्रेम दिवसके इस प्रतीकसे वहांके सामाजिक चरित्रमें कितना पतन हुआ है ?

२. उद्योग क्षेत्रके एक संगठन ‘एसोचेम’के अनुसार, इस दिवस हेतु भेंटवस्तुएं अधिक मात्रामें क्रय किए जानेके कारण भारतीयोंके २२ सहस्र कोटि अर्थात् २२ हजार करोड रुपयोंसे भी अधिक राशि लुट जाती है । भारतमें अनुमानतः १५ सहस्र कोटि शुभकामना-पत्रोंका (ग्रीटिंग कार्ड) विक्रय (ब्रिक्री) होता है । अमेरिकाके ‘ग्रीटिंग कार्ड एसोसिएशन’का अनुमान है कि प्रायः (लगभग) एक अरब वेलेंटाइन डे शुभकामना पत्र प्रत्येक वर्ष सम्पूर्ण विश्वमें भेजे जाते हैं, जिसके कारण, क्रिसमसके अतिरिक्त ‘वैलेंटाइन डे’को शुभकामना पत्र भेजनेवाले दूसरे सबसे बडे दिवसके रूपमें जाना जाता है । एसोसिएशनका मानना है कि अधिकतर पुरुष, महिलाओंकी अपेक्षा दुगना धन व्यय करते हैं । क्या हम भारतीय जहां आए दिन भुखमरी एवं आर्थिक विपन्नताके कारण किसान आत्महत्या कर रहे हो, वहां हम इस प्रकारके अपव्यय करनेके अधिकारी हैं ? किंचित सोचें ! क्या यह अपव्यय राष्ट्र एवं समाज हितमें है ?

३. देहलीके एक औषधि विक्रय करनेवाले व्यक्ति अर्थात् मेडिकलकी दूकानके स्वामीने बताया, ख्रिस्ताब्द २०१४ में, १० फरवरीसे ही निरोध एवं गर्भनिरोधक दवाइयोंकी मांगमें १० गुनाकी वृद्धि हुई थी; जिससे अनेक स्थानोंमें यह वस्तु समाप्त हो गई थी । ख्रिस्ताब्द २०१३ में ‘ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टल स्नैपडील डॉट कॉम’पर भारतमें ‘वैलेंटाईन डे’पर एक ही दिनमें डेढ लाख निरोध बिके ।

निरोधकी एक ‘कंपनी’के सर्वेक्षणानुसार, ‘वैलेंटाईन डे’के दिनोंमें निरोधका विक्रय २५ गुनातक बढ जाता है ! इस प्रेम दिवसकी घृणित सच्चाई जानकर आपको भी निश्चित ही आश्चर्य और लज्जा हो रही होगी; किन्तु सत्यसे मुंह मोडकर सत्यको न छुपाया जा सकता है और न ही उसे परिवर्तित किया जा सकता है ।

ओ. हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना ही है इन पाश्चात्य कुप्रथाओंको बन्द करनेका एकमात्र उपाय :

सबसे दु:खकी बात यह है यदि कोई सामाजिक या सांस्कृतिक उत्थान हेतु कार्यरत संगठन, इन दिशाभ्रमित युवाओंको नींदसे जगानेका प्रयास करता है तो कुछ पुरोगामी जिसे अधोगामी कहना अधिक उचित होगा, उन्हें ‘मोरल पुलिस’की संज्ञा देकर उनकी भर्त्सना करते हैं । अर्थात् हमारी युवा पीढी भ्रमित होकर पश्चिमी सभ्यताका अन्धानुकरण करना चाहती है और हम सब उसे करने दें, ये आजके स्वैराचारियोंकी धारणा होती है; किन्तु हम सभी कर्मनिष्ठ हिन्दुओंको सतर्क होकर ऐसी कुप्रथाओंका मुखर होकर विरोध करना होगा अन्यथा इस देशकी जनताका धन विदेशी प्रतिष्ठानोंमें बहता रहेगा और हमारी युवा पीढी पाश्चात्योंकी अपनी उपभोक्तावादी एवं भोगवादी संस्कृतिकी ग्रास बननेमें पूर्ण रूपेण सफल हो जाएगी जो आनेवाले कालके लिए विनाशक सिद्ध होगा और यह हमें नहीं होने देना है । अपने ही देश में, अपने श्रेष्ठतम सांस्कृतिक मूल्योंके स्थानपर फूहड विदेशी सभ्यता और संस्कृतिको हम नहीं पनपने देंगे, यह संकल्प हम सभीको लेना होगा । अभिभावकोंको स्वयं भी अपनी युवा होती सन्तानोंको सुसंस्कारित करनेका प्रयास करना होगा एवं उनके अन्तर्मनमें अपनी संस्कृतिके प्रति प्रेम निर्माण कर उन्हें धर्माभिमानी एवं नीतिवान बनाना होगा ।

स्वतन्त्रता पश्चात् इस देशका निधर्मी लोकतन्त्र, हमारी वैदिक संस्कृतिके पतनको रोकनेमें पूर्ण रूपेण असक्षम रहा है और इस हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करना अपरिहार्य हो गया है; क्योंकि हिन्दू राष्ट्रमें स्वैराचार एवं व्यभिचारको उद्युक्त करनेवाली सभी कुप्रथाओंको पूर्ण रूपेण प्रतिबन्धित किया जाएगा और समाजमनपर धर्म और साधनाके संस्कार अंकित किए जाएंगे । -तनुजा ठाकुर



4 responses to “वैलेंटाइन डे मानना अर्थात् हमारी दैवी वैदिक संस्कृतिको है कलंकित करना !”

  1. उपेन्द्र त्रिपाठी says:

    सामयिक एवं अत्यंत उपयोगी जानकारियां।

  2. कुंज बिहारी भंडारी says:

    मैं उपरोक्त विचारों से एकदम सहमत हूं और आपकी प्रत्येक बातों का समर्थन करता हूं

  3. Poonam Babbar says:

    सहमत

  4. Poonam Babbar says:

    वैलेंटाइन डे मानना अर्थात् हमारी दैवी वैदिक संस्कृतिको है कलंकित करना !”

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