साठ प्रतिशतसे अधिक आध्यात्मिक स्तरके व्यक्तिका यदि तीव्र प्रारब्ध न हो तो या तो उनका विवाह नहीं होता या विवाहके कुछ समय उपरांत वे सन्यस्त-जीवन समान जीवन व्यतीत करते हैं । ऐसे साधक विवाहके इच्छुक नहीं होते या वे उच्च कोटिके संतके मार्गदर्शनमें साधना करते हुए सन्यासी समान जीवन व्यतीत करते हैं अथवा यदि गृहस्थ हों तो भी सदाचारपूर्ण वर्तन करते हुए आत्मनियंत्रणकी प्रक्रियाका अभ्यास करते हैं । ऐसे साधक साधना करनेपर अपनी विषय–वासनाओंको सहज ही नियंत्रित कर सकते हैं ऐसा मैंने अपने धर्मप्रसारके मध्य शोधमें पाया है –तनुजा ठाकुर (२५.२.२०११)