राम राज्य आदर्श राज्य था, भगवान राम एक आदर्श राजा थे, सीता माताके चरित्रपर एक सामान्य रजकके मात्र शंका व्यक्त करनेपर उन्होंने उनका परित्याग किया; इससे ही वे कितने प्रजावत्सल थे ?, यह ध्यानमें आता है । उन्हें ज्ञात था कि उनकी अर्धांगिनी साक्षात नारायणी हैं; अतः वे अनन्त कालतक पूजी जाएंगी; किन्तु एक रजकके असन्तोष होनेपर प्रजामें उस भावनाको बल मिलेगा; इससे राज्यमें अराजकता निर्माण हो सकती है; इसीलिए उन्होंने अपनी पत्नीका परित्याग किया ! राजाके लिए प्रजाका विचार करना, यह प्रथम धर्म होता है, कौटिल्य राजधर्मके इस सिद्धान्तका प्रतिपादन करते हुए कहते हैं –
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम् ।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ।।
अर्थ : प्रजाके सुखमें राजाका सुख निहित है; अर्थात जब प्रजा सुख अनुभव करे, तभी राजाको सन्तोष करना चाहिए । प्रजाका हित ही राजाका वास्तविक हित है । वैयक्तिक स्तरपर राजाको जो अच्छा लगे, उसमें उसे अपना हित नहीं देखना चाहिए; अपितु प्रजाको जो योग्य लगे, अर्थात जिसके हितकर होनेका प्रजा अनुमोदन करे, उसे ही राजा अपना हित समझे !
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