‘बुर्का’ और ‘हिजाब’, ये मुसलमान महिलाओंपर हुए अत्याचार और अपमानका प्रतीक ! – तस्लीमा नसरीन


१४ फरवरी, २०२२
‘बुर्के’से स्वयंको ढंकना, यह मैं अधिकार नहीं समझती, यह स्त्रीपर हुए अत्याचारका प्रतीक है । ‘बुर्का’ और ‘हिजाब’का ‘महिलाओंको लैंगिक वस्तु बनाना’, यह एक ही उद्देश्य है । यह वस्त्रका टुकडा मुसलमान महिलाओंपर हुए अत्याचार और अपमानका प्रतीक है । स्त्रियोंको देखते ही लार टपकानेवाले पुरुषोंसे स्त्रियोंको स्वयंको छुपाना पडता है, यह वस्तुस्थिति स्त्री और पुरुष दोनोंके लिए सम्माननीय नहीं, ऐसा मत बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीनने ‘द प्रिंट’ वृत्त संकेतस्थलपर प्रकाशित हुए लेखमें व्यक्त किया है ।
तस्लीमा नसरीनद्वारा लेखमें प्रस्तुत किए सूत्र :
१. जब किसी महिलाको ‘हिजाब’ पहननेके लिए बाध्य किया जाता है, ऐसे समय मैं ‘हिजाब’ फेंकनेवालोंकी ओरसे खडी रहती हूं । व्यक्तिगत रूपसे मैं ‘बुर्का’ और ‘हिजाब’के विरोधमें हूं । ‘महिलाओंको ‘बुर्का’ पहननेके लिए विवश करना यह विकृत संस्कृतिका प्रतीक है’, ऐसा मुझे लगता है ।
२. ‘हिजाब’पर हो रहा संघर्ष रोकनेके लिए समान नागरिक विधान और एक समान गणवेश आवश्यक है । इस्लामका अधिकार यह शिक्षाके अधिकारसे ऊपरका नहीं ।
३. ‘बुर्का’ और ‘हिजाब’, स्त्रीकी ‘पसन्द’ कभी भी नहीं हो सकते । ‘पसन्द’ हटा दिए जानेके पश्चात ही उसे पहना जाता  है । राजनीतिक इस्लामके समान ‘बुर्का’ और ‘हिजाब’ भी आज राजनीतिक है । परिवारके लोग महिलाको ‘बुर्का’ और ‘हिजाब’ पहननेके लिए विवश करते हैं । यह बचपनसे नियमित बुद्धिभेद (माइंडवाश) करनेका परिणाम है । ‘बुर्का’ और ‘हिजाब’ जैसे धार्मिक परिधान, व्यक्तिका अभिज्ञान (पहचान) कभी नहीं हो सकते ।
४. विभाजनके ७४ वर्षों पश्चात भी हिन्दू और मुसलमानके बीच अन्तर न्यून नहीं हुआ है । पाकिस्तान भारतसे पृथक होकर ‘इस्लामिक राष्ट्र’ बना है; किन्तु भारतको कभी भी पाकिस्तान नहीं होना था । यह ७४ वर्ष पूर्व सहजतासे ‘हिन्दू राज्य’ बन सकता था ।
     तस्लीमा नसरीनका वक्तव्य पूर्णतः सटीक है; मुसलमान समाजको अपने मूल वास्तविकताका बोधकर सनातन धर्ममें पुनः लौटनेको उद्यत होना चाहिए; इसीमें समष्टि हित है; अन्यथा कालान्तरमें घोर अशान्ति, क्लेश व युद्ध जन्य रूपी कलियुगी वातावरण सर्वत्र होगा । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ


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