दूसरोंका विचार करना साधकत्व है !


अत्यंत पुरानी कथा है। किसी गांवमें दो भाई रहते थे। बडे भाईका विवाह हो चुका था । उसके दो बच्चे भी थे; परंतु छोटा भाई अभी कुंवारा था।

दोनों साझा खेती करते थे। एक बार उनके खेतमें गेहूंकी फसल पक कर तैयार हो गई। दोनोंने मिलकर फसल काटी और गेहूं तैयार किया। इसके बाद दोनोंने आधा-आधा गेहूं बांट लिया। अब उन्हें ढोकर घर ले जाना बचा था। रात हो गई थी, इसलिए यह काम दूसरे दिन ही हो पाता। रातमें दोनोंको फसलकी रखवालीके लिए खलिहानपर ही रुकना था। दोनोंको भूख भी लगी थी। दोनोंने बारी-बारीसे भोजन करने की सोची। पहले बडा भाई भोजन ग्रहण करने चला गया।

छोटा भाई खलिहानपर ही रुक गया। वह सोचने लगा – भैयाका विवाह हो चुका है, उनका परिवार है, इसलिए उन्हें अधिक अनाजकी आवश्यकता होगी। यह सोचकर उसने अपने ढेरसे कई टोकरी गेहूं निकालकर बडे भाईवाले ढेरमें मिला दिया। बडा भाई थोडी देरमें खाना खाकर लौटा। उसके पश्चात  छोटा भाई भोजन ग्रहण करने घर चला गया।
बडा भाई सोचने लगा – मेरा तो परिवार है, बच्चे हैं, वे मेरा ध्यान रख सकते हैं, परंतु मेरा छोटा भाई तो एकदम अकेला है, इसे देखनेवाला कोई नहीं है। उसे मुझसे अधिक गेहूंकी आवश्यकता है। उसने अपने ढेरसे उठाकर कई टोकरी गेहूं छोटे भाईवाले गेहूंके ढेरमें मिला दिया ! इस तरह दोनोंके गेहूंकी कुल मात्रामें कोई कमी नहीं आई। हां दोनोंके आपसी प्रेम और भाईचारेमें थोडी और वृद्धि अवश्य हो गई।



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