जय भगवति देवि नमो वरदे जय पापविनाशिनी बहुफलदे ।
जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे ।।१।।
अर्थ : हे वरदायिनी देवी, हे भगवति, तुम्हारी जय हो ! हे पापोंको नाश करनेवाली और अनन्त फलोंको प्रदान करनेवाली देवी, तुम्हारी जय हो ! हे शुम्भ-निशुम्भके मुण्डोंको धारण करनेवाली देवी, तुम्हारी जय हो ! हे मनुष्योंकी पीडा हरनेवाली देवी, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं ।
जयचन्द्रदिवाकरनेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे ।
जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे ।।२।।
अर्थ : हे सूर्य-चन्द्रमारूपी नेत्रोंको धारण करनेवाली देवी, तुम्हारी जय हो ! हे अग्निके समान देदीप्यमान मुखसे शोभित होनेवाली, तुम्हारी जय हो । हे भैरव शरीरमें लीन रहनेवाली और अन्धकासुरका शोषण करनेवाली देवी, तुम्हारी जय हो, जय हो !
जय महिषविमर्दिनी शूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे ।
जयदेवि पितामहविष्णुनते जय भास्करशक्रशिरोवनते ।।३।।
अर्थ : हे महिषासुरका मर्दन करनेवाली, शूलधारिणी और लोकके समस्त पापोंको दूर करनेवाली भगवती, तुम्हारी जय हो ! ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और इन्द्रसे नमस्कृत होनेवाली हे देवी, तुम्हारी जय हो, जय हो !
जय षण्मुखसायुधईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते ।
जय दुःखदरिद्रविनाशकरे जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे ।।४।।
अर्थ : सशस्त्र शंकर और कार्तिकेयजीद्वारा वन्दित होने वाली देवी, तुम्हारी जय हो ! शिवके द्वारा प्रशंसित एवं सागरमें मिलनेवाली गंगारूपिणी देवी, तुम्हारी जय हो ! दुख और दरिद्रताका नाश करनेवाली तथा पुत्र-कलत्रकी (परिवारकी) वृद्धि करनेवाली हे देवी, तुम्हारी जय हो, जय हो !
जय देवि समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनी दुख हरे ।
जय व्याधिविनाशिनी मोक्षकरे जय वांछितदायिनी सिद्धिवरे ।।५।।
अर्थ : हे देवी, तुम्हारी जय हो ! तुम समस्त शरीरोंको धारण करनेवाली, स्वर्गलोकका दर्शन करानेवाली और दुःखहारिणी हो । हे व्याधिनाशिनी देवी, तुम्हारी जय हो ! मोक्ष तुम्हारे अधीन है, हे मनोवांछित फल देनेवाली अष्ट सिद्धियोंसे सम्पन्न परा देवी, तुम्हारी जय हो !
एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं यः पठेन्नियतःशुचिः ।
गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा ।।६।।
अर्थ : माताके कोई भी भक्त, जो कहीं भी रहकर पवित्र भावसे नियमपूर्वक इस व्यासकृत स्तोत्रका पाठ करता है अथवा शुद्ध भावसे घरपर ही पाठ करता है, उसके ऊपर भगवती सदा ही प्रसन्न रहती हैं ।
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