तेलंगानामें मन्दिरोंकी दुर्दशा, २४ सहस्र एकड भूमिपर भू-माफियाओंका अधिकार, शासन सुप्त !!


अप्रैल १९, २०१९
   
तेलंगाना राज्‍यमें मन्दिरोंकी लगभग २४ सहस्र एकड भूमि भू-माफियाके अधिकारमें है । समूचे प्रदेशमें मंदिरोंको दानमें मिली धर्मार्थ भूमि ८७ सहस्र एकड है, यह भूमि उसका लगभग २५ प्रतिशत है । आकारमें देखा जाए तो भू-माफियाके नियन्त्रणमें आई इस भूमिका क्षेत्रफल इतना है कि इसमें हैदराबादके बाहर बसे साइबराबाद जैसे दो उपनगर बस जाएं !!

इन अवैध अधिकारमेंसे कुछने यह भूमि प्‍लॉट काटकर विक्रय कर दी है । विशेषतः हैदराबाद और उसके आसपासके रंगा रेड्डी जनपदमें, कुछपर अवैध रूपसे कृषि की जा रही है ।


धर्मार्थ विभागने गत वर्ष ही राज्‍य शासनके पास अपनी विवरण जमा कियाहै । इसके अनुसार, पहलेके नालगोंडा जनपदमें ३५०० एकडपर अतिक्रमण किया गया है । यह समूचे प्रदेशमें सबसे अधिक है । लगभग २२०० एकड भूमिपर हैदराबादमें और लगभग १८०० एकडपर रंगा रेड्डी जनपदमें अतिक्रमण हो चुका है । कुल अतिक्रमण हुई १६००० एकड भूमि तो लोगोंने अपने नाम पंजीकृत करा ली है !!


गुरुवारको धर्मार्थ विभागके कमिश्‍नर अनिल कुमारने कहा, ‘कुछ लोगोंने निजी स्‍वार्थके लिए धर्मार्थ भूमिपर अधिकार कर लिया है । ऐसे सभी अवैध अधिकार करनेवालोंसे कहा है कि वे यह भूमि मंदिरोंको सौंप दें । यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो उन्‍हें बलात हटानेके अतिरिक्त उनके विरुद्घ आपराधिक कार्यवाहीके अन्तर्गत पग उठाए जाएंगें ।’


इस प्रकरणमें सबसे रोचक बात यह है कि गत पचास वर्षोंमें विभागने इस भूमिका कभी सर्वेक्षण नहीं कराया था । जब राजस्‍व विभागने भू-अभिलेख अद्यतन (अपडेट) करनेका काम किया किया तो इस बातकी जानकारी हुई । राज्‍य शासनने राजस्‍व विभागसे कहा है कि वह सम्बन्धित मन्दिरोंके मुख्‍य देवताके नामसे भूमिकी पट्टादार ‘पासबुक’ जारी करें ।

 

“स्वतन्त्रताके पश्चात मन्दिरोंका स्थान शासकगणोंकी दृष्टिमें केवल धनकी एक तिजोरी मात्रका रह गया है । जब धनकी आवश्यकता होती है तो मात्र तभी ही मन्दिरोंकी स्मृति होती है और जब उनके लिए कुछ करनेकी आवश्यकता होती है तो शासन पल्ला झाड लेता है और हिन्दुओंकी तो स्थिति और दयनीय है । मन्दिर आदिमें तओ आज उनकी रूचि ही नहींहै तो देवस्थानोंकी यदि ऐसी विडम्बना हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए । एक धर्मनिष्ठ समाज ही धर्मका भार कन्धोंपर ले सकता है; परन्तु आजकी लोभी वृत्तिने हिन्दुओंको धर्मसे विमुख कर दिया है; अतः अब धर्मशिक्षण देकर सुदृढ धर्मनिष्ठ समाजका निर्माण अनिवार्य है और ऐसे प्रकरणसे बोध होता है कि हिन्दू मन्दिरोंकी ऐसी विडम्बना हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाके पश्चात ही रोकी जा सकती है । ”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : जागरण



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