शहरमें रहनेवाले लोग मायाके अधीन जीवन जीते हैं । अधिकतर इस माया चक्रमें ईश्वरको भूल जाते हैं । अनेक सुख-सुविधाओंके होनेके कारण उनके शरीरको कार्य करनेकी प्रवृत्ति नहीं रहती । उसी तरह प्रलोभन एवं स्वार्थके कारण उनकी वृत्ति संकुचित एवं प्रेमभाव रहित हो जाती है । इससे उनके मनकी निर्मलता एवं आनंदका लोप होकर उनका मन तनावग्रस्त रहता है । उसी प्रकार शरीरको कष्ट देनेकी प्रवृत्ति न रहनेसे शारीरिक व्याधियां उन्हें ग्रसित कर लेती हैं । इसके विपरीत गांवके लोग निर्मल और
मिलनसार होते हैं। वे श्रम करने हेतु कष्ट उठाते हैं एवं मायाके प्रलोभनसे दूर होनेके कारण तथा ईश्वरपर श्रद्धाके कारण उनके मुखपर आनन्द दिखाई देता है । वे निरोगी होते हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले (२३.१२.२०१३)
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