गीता सार


न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌ ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ – श्रीमदभगवद्गीता (३:५)
अर्थ : निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी कालमें क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृतिजनित गुणोंद्वारा परवश हुआ कर्म करनेके लिए बाध्य किया जाता है |

भावार्थ : यह विश्व कर्मप्रधान है | अतः चींटीसे लेकरमनुष्य तक सब सदैव कर्मरत दिखाई देते हैं | पशु मात्र अपनी निद्रा, भय, प्रजनन और आहार इन सब विषयोंके अनुरूप कर्म करता है, इसलिए पशु योनिको भोग योनि कहा गया है | मनुष्य एक चिंतनशील प्राणी है क्योंकि उसके पास ही मात्र मन और बुद्धि है और इस कारण वह मनन कर सकता है और परम तत्त्व से साक्षात्कार भी कर सकता है|
मनुष्य अपने प्रकृतिजनित गुणोंके आधारपर कर्मरत रहता है जैसे सात्त्विक प्रवृत्तिका मनुष्य अपनी आध्यात्मिक प्रगति एवं समाज कल्याणको प्रधानता देता है और अतः उसके कर्म इन्हीं परिधिमें घूमते हैं | रजोगुणी व्यक्ति यश, समृद्धि और भोग हेतु इच्छा करता है और वह इसी दिशामें प्रयास करता है | उसके अधिकांश कर्म मात्र अपने एवम अपने कुटुंबके हित हेतु केन्द्रित रहता है|
तमोगुणी व्यक्ति हिंसा, वासना एवं भोगमें लिप्त रहता है, वह अपने सुख हेतु किसीको हानि पहुंचा सकता है | अतः उसकेद्वारा किए गए अधिकांश कर्म कुकर्म होते हैं |

-तनुजा ठाकुर

 



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