
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ – श्री मदभगवद्गीता (५:२२)
अर्थ : जो ये इन्द्रिय तथा विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले सब भोग हैं, यद्यपि विषयी पुरुषोंको सुखरूप भासते हैं, तो भी दुःखके ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन! बुद्धिमान विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता |
भावार्थ : जिन वस्तुओंसे हमें सुखकी प्राप्ति होती है वे ही हमारे दुखका कारण होती है | जैसे पुत्रीका विवाह करना सुखद अनुभूति देता है; परंतु यदि ससुराल पक्षमें उसे कष्ट हो तो वह दुखका कारण बन जाता है अर्थात संसारके प्रत्येक विषय सुख और दुखका अनुभव करवाता है | सुख और दुख वस्तु काल एवं स्थान सापेक्ष होता है | इसके विपरीत आनंद सुख-दुखसे परे की स्थितिको कहते हैं जो वस्तु काल एवं स्थान निरपेक्ष होता है; परंतु सर्व सामान्य व्यक्ति साधनाके अभावमें इसकी अनुभूति नहीं होती है अतः वह विषयोंमें ही आनंद ढूँढनेका निरर्थक प्रयास करता है | कुछ विषयोंके भोगसे सुखकी अनुभूति होती है इसलिए वह उसमें लित्प रहता है तो कुछको आनंद और सुखमें भेद ही नहीं ज्ञात होता और वह सांसारिक सुखको ही आनंद समझ बैठता है और जब उसे उन्हीं विषयोके कारण दुख होता है तब या तो वह ईश्वर या अपना प्रारब्धको दोष देता है या वह अंतर्मुख हो जाता है और अपने दुखोंके मूल कारण को ढूंढते-ढूंढते उसे सांसरिक विषयोंसे वैराग्य निर्माण हो जाता है | परंतु सांसरिक विषयोंको शाश्वत सुख या आनंदके अनुभूति आज तक किसीको नहीं हुई है अतः बुद्धिमान और ज्ञानी उसमें लिप्त नहीं होते हैं |
-तनुजा ठाकुर
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