ईश्वरसे एकरूपता पश्चात धर्मग्रंथोंकी आवश्यकता ब्रह्मवेताको नहीं होती


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गीता सार :
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ श्रीमदभगवद्गीता (२:४६)

अर्थ : सब ओरसे परिपूर्ण जलाशयके प्राप्त हो जानेपर छोटे जलाशयमें मनुष्यका जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्मको तत्वसे जाननेवाले ब्राह्मणका समस्त वेदोंमें उतना ही प्रयोजन रह जाता है ॥

भावार्थ : एक बार शब्दातीत ब्रहमकी प्रचीति हो जाये तब उस जीवात्माको वेद समान श्रेष्ठतम धर्मग्रंथमें भी रुचि समाप्त हो जाती है | आत्मसाक्षात्कारके पश्चात जीवात्माको तृप्ति एवं परिपूर्णताका बोध होता है अतः शब्दजन्य ज्ञानका प्रयोजन नहीं रह जाता | ईश्वर, धर्म, संत और गुरुके महत्त्वको समझनेके लिए आत्मसाक्षात्कारसे पूर्व धर्मग्रंथोंके माध्यमसे प्राप्त शाब्दिक ज्ञान साधकके बुद्धिको शुद्ध कर उसे साधनाके पथपर अग्रसर होने हेतु आवश्यक स्फूर्ति एवं प्रेरणा प्रदान करती है, उसे अडचनोंके प्रति दृष्टिकोण देती है, अनुभूतिका विश्लेषण करना सिखाती है और परमतत्त्वसे एकरूप होनेकी प्रक्रिया हेतु योग्य मार्गदर्शन करती है | ईश्वरसे एकरूपता पश्चात धर्मग्रंथोंकी आवश्यकता ब्रह्मवेताको नहीं होती क्योंकि ईश्वर समान वे भी सर्वज्ञ हो जाते हैं|

-तनुजा ठाकुर



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