गीता सार
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ – श्रीमदभगवद्गीता ३:३८
अर्थ : जिस प्रकार धुएँसे अग्नि और मैलसे दर्पण ढंका जाता है तथा जिस प्रकार जेरसे गर्भ ढंका रहता है, वैसे ही उस कामद्वारा यह ज्ञान ढंका रहता है|
भावार्थ : काम अर्थात इच्छाएं | आत्मज्ञानकी प्रक्रियामें सबसे बडा अवरोधक काम है | इच्छाएं जितनी अधिक होंगी, हम उसे पूर्ण करने हेतु उतने ही अधिक प्रयत्नशील होंगे और इस कारण माया-मोहके संसारमें उतने ही लिप्त होते रहेंगे | धर्मशास्त्रोंमें इच्छाओंकी तृप्तिको अधिक महत्त्व नहीं दिया गया है अपितु इच्छाओंके त्यागको अधिक महत्त्व दिया गया है | क्योंकि इच्छाओंकी तृप्ति एक प्रकार चिंगारीको हवा देनाका कार्य करती है अतः हम जितना अधिक उसकी तृप्तिमें लिप्त रहेंगे वह उतना ही अधिक वे जागृत होते रहेंगे | अतः भारतीय संस्कृतिका एक सरल एवं सर्व विदित सिद्धान्त है ‘संतोषं परम सुखं’ अर्थात संतोषी जीव तृप्त भी रहता और आनंदमें भी रहता है | इच्छाका प्राबल्य हमारे आत्मज्योतिके प्रकाशको ढक कर हमें अज्ञानताके भवसागरमें उलझा देता है |
आजकी पीढीके पास तीस वर्षकी आयुमें जीवकोपार्जन हेतु घर, वाहन, मनोरंजनके सर्व साधन उपलब्ध होनेपर भी वह अन्य इच्छाओंकी पूर्ति हेतु प्रयत्नशील होते हैं और परिणामस्वरूप शारीरिक और मानसिक अशांतिके शिकार हो जाते हैं | इच्छाएं अनंत हैं सम्पूर्ण जीवन, मानव यदि उसकी तृप्ति हेतु प्रयत्नशील रहें तो भी उसकी समाप्ति असंभव है | एक लाखमें कोई एक व्यक्ति इच्छाओंके तृप्त होनेपर उसे उस वस्तुके प्रति वैराग्य भाव निर्माण हो पाता है और वह भी उसके पूर्व संचितके पुण्य जागृत होनेके और ईश्वरीय कृपाके कारण होता है |
इच्छाओंपर विजय कैसे प्राप्त करें ?
१. हमारा यह मनुष्य जीवन इच्छाओंकी तृप्ति हेतु नहीं अपितु साधनाकर इच्छाओंपर विजय पाने हेतु है यह मनको बार –बार सूचित करें |
२. ‘संतोषं परम सुखं’ इस सिद्धांत अनुसार ईश्वरने जितना दिया वह पर्याप्त है यह सोच जीवन यापन करें |
३. जब-जब नयी नयी इच्छाओंका जन्म हो और उसके पूर्ति हेतु मनमें विचार आए, अपनेसे नीचेवाले श्रेणीके व्यक्तिको देखें कि वह उन संसाधनोंके बिना कैसे जीवनयापन कर रहे हैं | इससे आपकी इच्छा शांत हो जाएगी |
४. साधना करें, इससे आपके मनमें नए-नए संस्कारोंका जन्म नहीं होगा और प्रत्येक परिस्थितिमें आपको योग्य आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्राप्त होनेके कारण इच्छाओंको नियंत्रित करनेमें सहायता होगी |
५. एक इच्छाके पूर्ण होनेपर दूसरी इच्छा स्वतः ही उभर कर आ जाती है, मनका यही कार्य है अतः मनको नियंत्रित करने हेतु स्वयंसूचना दें |
६. भोगमें नहीं अपितु त्यागमें आनंद समाहित है यह विषय मनको बार-बार बताएं |
७. ईश्वरके नामका अखंड जप करें इससे सहज ही मन नियंत्रित होने लगता और इच्छाओंकी जननी मन, मनोलयकी ओर बढने लगता है |-तनुजा ठाकुर
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