गीता सार


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अव्यक्तादीनिभूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ – श्रीमद्भगवद्गीता (२.२८)
भावार्थ : हे अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मृत्यु पश्चात भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल मध्यमें(शरीर रूप में) ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थितिमें क्या शोक करना ?
भावार्थ : पितरोंके कष्टके विषयमें सुननेके पश्चात कुछ अल्पज्ञानी एवं तथाकथित ज्ञानमार्गी कहते हैं कि भगवान कृष्णने गीतामें कहा है कि मृत्यु उपरांत जीवात्मा पुनः शरीर धारण कर लेती है अतः पितरोंका तो तुरंत जन्म हो जाता है फिर उन्हें गति नहीं मिलने वाला विषय कहां उठता है ?
ऐसे प्रश्नोंका उत्तर देनेके लिए अध्यात्मशास्त्र समझ लें | पहली बात तो यह है कि जब तक संपूर्ण संचित समाप्त नहीं हो जाता जीवात्मा बार-बार पृथ्वीपर जन्म-मरणके चक्रको धारण करती है | पृथ्वीको मिलाकर सात लोक है भू, भुव, स्वर्ग, महा, जन, तप और सत्य | मृत्यु उपरांत जीवात्मा अपने कर्म अनुसार एवं साधना अनुसार विभिन्न लोकोंमें जाती हैं | यदि किसी जीवात्माने बहुत से पाप कर्म किया है तो सुए नरक यातना भोगन पड़ता है और यदि पुण्य किये हो तो उस जीवात्माको स्वर्गलोकका सुख प्राप्त होता है | स्वर्गलोकमें पुण्य भोगकर समाप्त करनेके पश्चात् या नर्कमें दंड भोगनेके पश्चात उसे पुनः पृथ्वीपर जन्म धारण करना पड़ता है | यह क्रम चलता रहता है | जो जीवात्मा साधना कर ब्रह्म्ज्ञानी हो जाते हैं उनका यह जन्म-मृत्युका चक्र समाप्त हो जाता है और वे महालोकमें चले जाते हैं और पुनः पृथ्वीपर द्रुत गतिसे साधना हेतु या ईश्वर इच्छासे धर्मकार्य करने हेतु आते हैं इन्हें दिव्य जीवात्मा कहता हैं
यदि किसी लिंगदेह की कोई वासना या इच्छा अतृत्प हो तो वह स्वर्ग या नरक का हेतु भी प्रवास नहीं कर पाती है और ऐसे लिंगदेह को अतृप्त लिंगदेह कहते हैं और इस हेतु उनके वंशज को साधना कर उन्हें गति देनी पड़ती है इसे पितृ ऋण भी कहते हैं | गीता के दुसरे भगवान श्री कृष्णने कहा है
संपूर्ण प्राणी जन्मसे पहले अव्यक्त थे और मृत्युके पश्चात अव्यक्त अस्तित्त्वमें रहते हैं मात्र इस धरती पर वे शरीरधारी होते हैं अतः उस विषय में चिंता कैसी ? अर्थात जन्मसे पहले भी जीवात्मा अव्यक्त अस्तित्व होता है और मृत्यु उपरांत पुनः जन्म लेने तक सूक्ष्म अस्तित्व होता है | अर्थात मृत्यु उपरांत तुरंत जन्म होता है यह नहीं कहा है यह ध्यान देने योग्य बिन्दु है |
इससे यह स्पष्ट होता है की तथाकथित बुद्धिवादी या तथाकथित ज्ञानमार्गीका ज्ञान खोखला और वे समाजको अध्यात्मका अर्थ का अनर्थ बता कर दिग्भ्रमित करते हैं|

-तनुजा ठाकुर

 

 



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