गीता सार


krishna-arjun

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌ ।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌ ॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌ ॥ – श्री मदभगवद्गीता (५: ८.९)
भावार्थ : तत्वको जाननेवाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा नेत्रोंको खोलता और मूंदता हुआ भी, सब इन्द्रियां अपने-अपने अर्थोंमें वर्तन कर रही हैं – इस प्रकार समझकर निःसंदेह ऐसा मानता है कि मैं कुछ भी नहीं करता हूं ॥8-9॥
भावार्थ : एक तत्त्वज्ञानीकी ज्ञानेंद्रियां और कर्मेन्द्रियां कार्यरत रहती हैं तब भी वह स्थिर रहते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि शरीरके चलायमान रहने हेतु जो भी कर्म आवश्यक वह इंद्रियां करेंगी ही या जो प्रारब्ध अनुसार घटित होना है उस निमित्त भी इंद्रियां अपने कर्म करेंगी ही; परंतु वह इन सब कृति होते समय भी वे तटस्थ रहते हैं; परिणामस्वरूप वे किसी कृतिके कर्ता नहीं होते एवं इंद्रियोंके कार्यरत रहनेपर भी उस पर कर्मफल न्यायके सिद्धान्त लागू नहीं होते और वे सहज होकर शरीरकी इंद्रियोंको साक्षीभावसे कार्यरत होते देखते हैं | जैसे एक बालकको रात्रिमें सोते समय यदि हम भोजन कराएं तो उसे सुबह उठनेपर उस कृतिका स्मरण नहीं रहता उसी प्रकारकी स्थिति आत्मानन्दमें लीन ब्रह्मवेत्ताओंकी भी होती है|

-तनुजा ठाकुर



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