गीता सार – परमेश्वरके भजनके समान अन्य कुछ भी नहीं है


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अपि  चेत्सुदुराचारो  भजते   मामनन्यभाक्‌ ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः
|| – श्रीमदभगवद्गीता (९:३०)

अर्थ :  यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भावसे मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है; अर्थात्‌ उसने भलीभांति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वरके भजनके समान अन्य कुछ भी नहीं है |

भावार्थ : कुछ व्यक्ति जो इस जन्ममें जानबूझकर या अज्ञानतामें पापकर्म करते हैं और जब उन्हें अपने कर्मोंका बोध होता है और वे आत्मग्लानिकी अग्निमें स्वयंको तपाने लगते हैं, तब अनेक बार उन्हें लगता है कि वे भक्ति करनेके पात्र नहीं, ऐसे सभी व्यक्तियोंके लिए गीताका यह श्लोक अत्यन्त प्रेरणादायक सिद्ध हो सकता है | भगवान श्रीकृष्ण यहां कहते हैं कि भक्ति किसी भी अधमसे अधम जीवको तार सकता है यदि वह अनन्य भावसे उन्हें भजे, इतना ही नहीं वह यदि दृढ निश्चय कर ईश्वर चरणोंमें स्वयंको पूर्ण रूपेण समर्पित कर देता है और उसे यह ज्ञात होता है कि उसके जीवनका सर्वस्व परमेश्वरका भजन करना है तो ऐसे व्यक्तिको साधू कहा जा सकता है | इस श्लोकका आशय यह है कि ईश्वर करुणाकर एवं क्षमाशील हैं, साधकको मात्र शरणागत होकर उनमें लीन होनेकी आवश्यकता होती है | –

-तनुजा ठाकुर



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