गीता सार: निज धर्मको कभी भी त्यागना नहीं चाहिए


श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌ ।

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ – श्रीमदभगवद्गीता (३: ३५)
अर्थ : अच्छी प्रकार आचरणमें लाए हुए दूसरेके धर्मसे गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है |
भावार्थ : कलियुगके आरंभ होने तक मात्र एक ही धर्म था और वह था वैदिक सनातन धर्म था | यह कलियुगका प्रकोप है कि इस कालके आरंभ होनेके पश्चात वेदोंके विरोधक, सगुण उपासनाके विरोधक, संस्कृतके विरोधक एवं सत्त्व प्रधान वैदिक जीवनप्रणालीके विरोधकोंने अपनेको धर्मसंस्थापक घोषितकर आसुरी पंथोंको धर्मका चोला पहना, समाजमें स्वयंभू भगवानके रूपमें स्थापित हो गए | अतः यह श्लोक कलिकालमें होनेवाले धर्मांतरणसे होनेवाली हानिका संकेत देता है | आज अनेक व्यक्ति प्रलोभन एवं स्वार्थपूर्ति हेतु निज धर्मको त्याग देते हैं और अन्य धर्मको सहजतासे अपना लेते हैं | ऐसे लोगोंको उससे होनेवाली हानिके बारेमें भगवान श्रीकृष्ण संकेत करते हुए कहते हैं दूसरोंका धर्मको अंगीकार करना भयावह है | अपना धर्म निकृष्ट हो तो भी उसका त्याग नहीं करना चाहिए यद्यपि अकाट्य सत्य तो यह है कि वैदिक सनातन धर्मसे श्रेष्ठ धर्म और कोई है ही नहीं अतः इस धर्मके रक्षणार्थ यदि प्राणोंकी आहुति देनी पडे तो वह भी कल्याणकारक है | कलियुगी पंथ मायावी होनेके कारण उसे धारण करनेसे धन-धान्यकी वर्षा तुरंत हो जाती है और कलियुगी जीवके जीवनका मुख्य उद्देश्य ऐश्वर्ययुक्त जीवन जीना है अतः स्वार्थी जीव आसुरी पंथोंके मायावी जालमें तुरंत फंस जाते हैं; परंतु कुछ काल उपरांत इनकी आनेवाली पीढीको प्रचंड कष्ट सहन करना पडता है और कुलनाश भी सहज ही हो जाता है | अतः सनातन धर्मियोंको निज धर्मको कभी भी त्यागना नहीं चाहिए |-

-तनुजा ठाकुर

 



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