चन्दन (भाग-२)
आयुर्वेदके अनुसार, चन्दनके पेड केवल एक प्रकारके ही नहीं होते । देश-विदेशमें चन्दनके पेड भिन्न-भिन्न प्रकारके पाए जाते हैं, जो इस प्रकार हैं : भारतीय चन्दनका स्थान विश्वभरमें सर्वोच्च है । इसका आर्थिक महत्त्व भी बहुत है । यह पेड मुख्यतः कर्नाटकके वनोंमें पाए जाते हैं तथा भारतके अन्य भागोंमें भी कहीं-कहीं पाए जाते हैं । भारतके ९०० ‘मीटर’तक कुछ ऊंचे स्थलों और मलयद्वीप इसके मूल स्थान हैं । यह परोपजीवी पेड है । इसके वृक्षकी आयुवृद्धिके साथ ही साथ, उसके तनों और जडोंके काष्ठमें (लकडीमें) सुगन्धित तेलका अंश भी बढने लगता है । इस अंशकी पूर्ण परिपक्वतामें १० से १२ वर्षतकका समय लगता है । इसके लिये ढालवां क्षेत्र, जल सोखनेवाली उपजाऊ चिकनी मिट्टी तथा ५०० से ६०० मि.मी.तक वार्षिक वर्षाकी आवश्यकता होती है ।
इसके तनेकी कोमल लकडी तथा जडको, कुन्दा, बुरादा तथा छिलका और छीलन आदिमें विभक्त करके विक्रय किया जाता है । इसकी लकडीका उपयोग मूर्तिकला तथा सजावट, सुशोभन तथा अलंकार सामग्री बनानेके लिए किया जाता है । अन्य उत्पादनोंमें, जैसे सुगन्धवर्तिका (अगरबत्ती), हवन सामग्री तथा सुगन्धित तत्त्वोंके निर्माणमें भी इसका उपयोग होता है । आसवनद्वारा इसका सुगन्धित तेल निकाला जाता है । प्रत्येक वर्ष लगभग ३००० ‘मीट्रिक टन’ चन्दनकी लकडीसे तेल निकाला जाता है । एक ‘मीट्रिक टन’ चन्दनकी लकडीसे ५० ‘किलोग्राम’तक चन्दनका तेल प्राप्त होता है । रसायनज्ञ इस तेलके सुगन्धित तत्त्वोंको सांश्लेषिक रीतिसे प्राप्त करनेका प्रयास कर रहे हैं ।
चन्दन (भाग-३)
चन्दनके प्रसारणमें पक्षी भी सहायक होते हैं । बीजोंद्वारा रोपणकर भी इसे उगाया जा रहा है । ‘सैंडल स्पाइक’ (Sandle spike) नामक रहस्यपूर्ण और सङ्क्रामक वानस्पतिक रोग इस वृक्षका शत्रु रहा है । इससे सङ्क्रमित होनेपर पत्तियां ऐंठकर छोटी हो जाती हैं और वृक्ष विकृत हो जाता है । इस रोगकी रोकथामके सभी प्रयास अबतक विफल हुए हैं ।
* मुख्य बातें : सनातन धर्ममें चन्दनका तिलक लगाना शुभ माना गया है और स्वास्थ्यके लिए भी अत्यन्त लाभदायक और हितकारी है । चन्दनके तिलकसे ध्यान शक्तिमें संचार होता है तथा दृढ एकाग्रताकी शक्तिमें भी वृद्धि होती है । आज्ञा चक्रपर चन्दनका तिलक लगानेसे तन्त्रिकाएं शान्त होने लगती हैं तथा सिरकी पीडासे भी मुक्ति प्राप्त होती है ।
* सबसे अच्छे चन्दनके लक्षण : जो चन्दन बहुत ही अच्छी गुणवत्ताका होता है, वह दिखनेमें श्वेत रंगका होता है; किन्तु जब उसके टुकडे किए जाते हैं, तो लाल रंगका हो जाता है । इसे घिसनेपर, इससे पीले रंग जैसा पदार्थ निकलता है । इसकी सुगन्ध अधिक होती है ।
* वेट्ट चन्दन : यह चन्दन बहुत अधिक ठण्डा होता है । इससे प्रयोगसे जलन, ज्वर, वमन (उल्टी), कफ आदि रोग ठीक किए जा सकते हैं ।
* पीत चन्दन : यह चन्दन भी सुगन्धमें तीक्ष्ण और ठण्डा होता है । यह कुष्ठरोग, कफ, ज्वर, जलनके कष्टमें लाभदायक होता है । इस प्रकारका चन्दन दाद, वात-विकार, विष, रक्तपित्त आदिमें प्रयोग किया जाता है ।
चन्दन (भाग-८)
* स्वेदकी (पसीनेकी) दुर्गन्धसे मुक्ति : बहुत अधिक लोगोंके स्वेदसे दुर्गन्ध आती रहती है । ऐसी स्थितिसे मुक्ति पानेके लिए, चन्दनके चूर्णको ‘गुलाब’ जलके साथ पीसकर लगाएं ! इससे लाभ होता है ।
* सिरकी पीडाके लिए : सिरमें पीडा होनेके कई कारण हो सकते हैं । कोई भी व्यक्ति, जो सिरकी पीडासे कष्टमें हो और आयुर्वेद पद्धतिसे सिरकी पीडासे मुक्ति पाना चाहता हो, उसे चन्दनको घिसकर मस्तकपर लगाना चाहिए, इससे सिरकी पीडामें शीघ्रतासे लाभ होता है ।
* ‘ल्यूकोरिया’को ठीक करनेके लिए : ‘ल्यूकोरिया’ महिलाओंको होनेवाला रोग है । इससे महिलाओंके शरीरमें संक्रमण (‘इंफेक्शन’) होनेकी आशंका बढ जाती है ।
अ. ऐसेमें श्वेत या लाल चन्दनका काढा बना लें ! इसे २० मि.ली. मात्रामें पीनेसे ‘ल्यूकोरिया’के रोगमें लाभ होता है ।
आ. ५ ग्राम चन्दनके चूर्णको दूध, तथा घीमें पका लें ! इसे ठण्डा करके मधु मिला लें ! इसे पीनेसे ‘ल्यूकोरिया’में शीघ्र लाभ होता है ।
* रक्तपित्त (नाक-कान आदि अंगोंसे रक्त बह जानेका कष्ट) : शरीरके भिन्न-भिन्न अंगोंसे, यदि रक्त बहता हो तो समान भागमें चन्दन, मुलेठी तथा लोध्रके मिश्रित चूर्णमें मधु मिला लें ! इसे चावलके धुले हुए पानीके साथ तीन दिनोंतक पिएं ! इससे रक्तपित्तमें लाभ होता है ।
अ. चन्दनके सूक्ष्म चूर्णको नाकके मार्गसे लेनेसे, नाकसे रक्त आना बन्द हो जाता है ।
चन्दन (भाग-९)
* चेचकके रोगमें चन्दनसे लाभ : चेचककी आरम्भिक अवस्थामें श्वेत चन्दनकी लेईको (‘पेस्ट’को) ‘हिलमोचिका’के रसमें घोलकर पिएं ! इससे चेचकमें लाभ होता है ।
* गठिया हेतु लाभकारी : गठियाके कष्टमें चन्दनके उपयोगसे बहुत लाभ हो सकता है । गठियाके रोगी २० मि.ली. चन्दनादि कषायमें, शक्कर तथा मधु मिलाकर सेवन करें ! इससे गठियामें लाभ होता है ।
* कुष्ठरोगमें लाभ : कुष्ठरोग एक छुआछूतका रोग माना जाता है । कई लोग कुष्ठरोगसे पीडित होते हैं । कुष्ठरोगको ठीक करनेके लिए श्वेत चन्दन तथा कर्पूरको सम मात्रामें लें, इन्हें एक साथ मिलाकर पीस लें ! इससे लेप करें ! इससे कुष्ठरोगमें लाभ होता है ।
* चन्दनके उपयोगी भाग : चन्दनका उपयोग इस प्रकार कर सकते हैं :
– आर्द्रावस्थामें कटा हुआ चन्दन पित्त रोगको ठीक करता है ।
– सूखे अवस्थामें कटा चन्दन वात रोगको ठीक करता है ।
– मध्यमावस्थामें कटा चन्दन, कफको ठीक करता है ।
– चन्दनके तेलके प्रयोगसे कफ, जलन, त्वचारोग, पीलिया, सांस रोग, ज्वर, निर्बलता आदिमें लाभ होता है ।
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