कच्चा चना ठण्डा, छोटा, अत्यन्त कोमल, वातकारक, मल रोकनेवाला, रुचिकारक, एवं जलन, प्यास, अश्मरी या पथरीमें लाभदायक होता है । काला चना शीतक, मधुर, बलकारक एवं रसायन, निश्वास, कास तथा पित्तातिसार नाशक होता है । काबुली चना गुरु, शीतक, मधुर, अत्यन्त रुचिकारक, वातकारक, पित्तशामक तथा बलवर्धक होता है ।
चनेका साग कषाय, अम्लीय, मल रोकनेवाला, रुचिजनक, कफ न्यून करनेवाला, कठिनतासे पचनेवाला, विष्टम्भी, पित्तशामक, दन्त सूजन कम करनेमें सहायक, कफवातशामक तथा देरसे पचनेवाला होता है ।
भुने हुए चने ‘गर्म’, रुचिकर, लघु, शक्ति बढानेवाले, शुक्राणु बढानेवाले, वातनाशक होते हैं ।
अन्य भाषाओंमें चनेके नाम : चनेका वानस्पतिक नाम (Cicer arietinum Linn.) (साइसर ऐरीटिनम) (Syn-Cicer album Hort) है । चना (Fabaceae) (फैबेसी) कुलका है । चनेको अंग्रेजी भाषामें ग्राम, चिक-पी कहते हैं; किन्तु भारतके अन्य प्रान्तोंमें भिन्न भिन्न नामोंसे जाना जाता है, जैसे : संस्कृतमें चणक, हरिमन्थ, सकलप्रिय, वाजिभक्ष्य, हिन्दीमें चना, रहिला, बूट, उर्दूमें बूट, चना, कन्नडमें कडले, केम्पू कडले, गुजरातीमें चण्या, चणा, तमिलमें कडेलै, सनुगलू, हरिमन्थ, बंगालीमें छोला, बूट, बूटकलाई, नेपालीमें चना, पंजाबीमें छोले, चने, मराठीमें हरभरा, चणे, मलयालममें कतला, अरबीमें जुमेज, हिम्मास ।
चनेके लाभ केवल उदर पूर्तितक सीमित नहीं हैं; अपितु यह शरीरके कई कष्टोंमें लाभदायक प्रमाणित हो सकता है । वहीं, इस बातका भी ध्यान रखा जाए कि चना किसी भी रोगकी चिकित्सा नहीं है । इसका सेवन शरीरको स्वस्थ बनाए रखने और रोगोंसे बचे रहनेके लिए किया जा सकता है ।
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