‘अर्थराइटिस’में चनेका लाभ : ‘अर्थराइटिस’की समस्या आयु देखकर नहीं आती है । दिनभर वातानुकूलित वातावरणमें रहनेके कारण या बैठकर अधिक कार्य करनेके कारण, व्यक्ति किसी भी आयुमें इस रोगसे ग्रस्त होने लगता है । चनेके पत्तोंको उबालकर, पीसकर कोहनियोंमें लगानेसे पीडा न्यून होती है ।
गठियाकी पीडाके लिए : प्रायः आयु बढनेके साथ घुटनोंमें पीडा होनेका कष्ट आरम्भ हो जाता है; किन्तु चनेका सेवन करनेसे, इससे विश्राम मिलता है । चनेके बेसनकी रोटी बनाकर, उसमें घी लगाकर खानेसे घुटनोंकी पीडा न्यून होने लगती है ।
‘सफेद धब्बे’के (दागके) लिए चना : Leucoderma ‘सफेद धब्बा’ एक प्रकारका चर्मरोग होता है । चनेका लाभ पानेके लिए ५ ग्राम चूर्णमें १ ग्राम बाकुची तथा ५०० मि.ग्रा. नीमका चूर्ण मिलाकर सेवन करनेसे ‘सफेद धब्बों’में लाभ होता है । मुंहासे, ‘दाग-धब्बे’ दूर करके चेहरेकी कान्ति बढ जाती है ।
चनेके बेसनका उबटन बनाकर चेहरेपर लगानेसे भी चेहरेकी कान्ति बढती है तथा मुंहासे व झाइयां मिटती हैं ।
ज्वरके लिए चना : २० से ५० मि.ली. चनेके रसका (जूसका) सेवन करनेसे ज्वरमें होनेवाली जलनसे मुक्ति मिलती है । समान मात्रामें भांग, भुने चने तथा गुडके चूर्णको मिलाकर सेवन करनेसे शीतज्वरसे (ठण्ड लगकर आनेवाला ज्वरसे) छुटकारा मिलता है ।
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