घरका वैद्य – जल तत्त्वद्वारा प्राकृतिक चिकित्सा (भाग-३)


इस सृष्टि क्रममें ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक तन्मात्राएं आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वीकी क्रमशः ‘गुण’ मात्र हैं, इनमें कोई विशेष भाव नहीं है और इनका सुख-दुख तथा मोह रूपसे अनुभव नहीं हो सकता और ये शान्त, घोर तथा गूढ नहीं हैं; अतः ये अविशेष हैं । उक्त पौराणिक सृष्टि क्रम, तुलना करनेपर आधुनिक-विज्ञानकी कसौटीपर पूर्ण रूपसे ‘खरा’ उतरता है ।
आधुनिक भौतिक-विज्ञानके अनुसार ‘जल’ की उत्पत्ति ‘हाईड्रोजन+ऑक्सीजन’ इन दो ‘गैसों’पर विद्युतकी प्रक्रियाके कारण हुई है । पौराणिक सिद्धान्तके अनुसार ‘वायु’ और ‘तेज’की प्रतिक्रियाके कारण ‘जल’ उत्पन्न हुआ है । यदि वायुको ‘गैसों’का समुच्चय एवं तेजको विद्युत माना जाए तो इन दोनों ही सिद्धान्तोंमें कोई अन्तर नहीं है; अतः जलकी उत्पत्तिका पौराणिक सिद्धान्त पूर्णतया विज्ञान-सम्मत सिद्ध होता है ।
 पुराणों और स्मृतियोंके अनुसार ‘जल’ आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक तीनों रूपोंमें विद्यमान है । वेदोंमें जलको आपो ‘देवता’ कहा गया है । ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद – इन तीनों संहिताओंमें, यद्यपि जलके लिए पूरे सौ पर्यायवाची शब्द प्रयुक्त हुए हैं, तथापि सर्वाधिक प्रयोग ‘आपः’ शब्दका हुआ है, इसका कारण है वस्तुतः आपः शब्द ‘आप्’ धातुका विकसित रूप है । आप् धातुका प्रयोग व्यापक होने, फैलने एवं सर्वत्र विद्यमान रहनेके अर्थमें किया जाता है । दूसरे शब्दोंमें, जो सर्वव्यापी है, जो फैल सकता है और जो सर्वत्र विद्यमान है, वह ‘आपः’ कहलाता है । ये तीनों लक्षण क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेशके वाचक हैं; अतः वेदोंमें यदि जलको आपो ‘देवता’ कहा गया है तो वह पूर्ण उपयुक्त है । साथ ही उपवृंहण करनेपर पुराणोंकी विचारधारासे भी मेल खाता है ।
 जलमें देवत्व होनेके कारण कहा गया है कि जलमें मल-मूत्र नहीं त्यागना चाहिए, न थूकना चाहिए । नग्न होकर स्नान नहीं करना चाहिए । जलमें मैथुन नहीं करना चाहिए । स्थिर या बहते हुए जलके प्रति कोई अप्रीतिजनक बात नहीं कहनी चाहिए । पवित्र या अपवित्र शरीरके स्पर्शसे जल कभी भी दूषित नहीं होता; किन्तु मटमैले, विरस, दुर्गन्धित और थोडे जलका उपयोग नहीं करना चाहिए ।
लाभ : इस तत्त्वका अभ्यासक अपनी क्षुधा और तृष्णापर (भूख और प्यासपर) नियन्त्रण पा लेता है । यही कारण था कि हमारे ऋषि लम्बे समयतक ध्यानमें रहनेपर भी इस मध्य उनको भूख और प्यास नहीं लगती थी ।
रंग एव आकृति : इसकी आकृति अर्धचन्द्र जैसी और रंग चांदीके समान माना गया है । ध्यानमें इसी आकृति और रंगका ध्यान किया जाता है ।


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