घरका वैद्य – जल तत्त्वद्वारा प्राकृतिक चिकित्सा (भाग-८)
ठण्डे जलके बाह्य प्रयोग
ठण्डे जलके बाह्य व आन्तरिक प्रयोगोंके विषयमें जाननेसे पूर्व, ठण्डे जलका हमारे शरीरपर क्या प्रभाव होता है ?, यह जान लेना अति आवश्यक है ।
किसी व्यक्तिके शरीरपर यदि एक द्रोणी (बाल्टी) ठण्डा पानी उंडेल दिया जाए तो सर्वप्रथम उसको अपने भीतर एक प्रकारका धक्कासा लगता प्रतीत होगा, जिससे वह विचलित होता दिखाई देगा, यह स्थिति शरीरके रक्तको भीतरकी ओर भेजनेवाले रक्तकोषोंमें सङ्कुचनके कारण उत्पन्न होती है, धक्कासा लगता प्रतीत होनेके साथ ही उस व्यक्तिको ठण्डक अनुभव होने लगेगी; क्योंकि त्वचापर जलके प्रयोगके कारण पहले ऊपरी भागके ठण्डा होते ही तथा रक्तके भी भीतर दूर चले जानेके कारण वहांकी उष्णता अल्प हो जाती है; फलस्वरूप शारीरिक विद्युतकी क्रिया मन्द पड जाती है और ठण्ड लगने लगती है; किन्तु यह सब लक्षण क्षणिक, तात्कालिक एवं अस्थाई ही होते हैं; क्योंकि इन लक्षणोंके प्रकट होनेके दूसरे ही क्षण इस क्रियाकी प्रतिक्रिया प्रारम्भ हो जाती है अर्थात नीचे गया हुआ रक्त पुनः तेजीसे या धीरे-धीरे त्वचाकी सतहकी ओर लौटता है । ऊपरी ठण्डे स्थानको ‘गर्म’ करने, सङ्कुचित शिराएं और कोष फैल जाते हैं, विद्युत स्फूर्ति बढ जाती है, नीले रक्तहीन चर्मपर ललाई छा जाती है तथा स्वेद (पसीना) बहने लगता है, जिसके माध्यमसे शरीरका विष उखडकर बाहर निकलने लगता है । शीतल जल प्रयोगके प्रतिक्रियावाले यह लक्षण दृढ, अधिक टिकाऊ और स्थाई होते हैं । शरीरपर ठण्डे जलका प्रयोग प्रथमके कुछ क्षणोंमें ठण्डक उत्पन्न करनेवाला, बुरा एवं असुविधाजनक प्रतीत होता है; परन्तु कुछ क्षण उपरान्त वह सदा ही शरीरको उष्ण करनेवाला, सुखदाई एवं अत्यन्त लाभदायक होता है । इस सम्बन्धमें यह बात स्मरण रखना चाहिए कि जल तथा शरीरके तापमानमें जितना ही अधिक अन्तर होगा उतना ही अधिक प्रतिक्रिया भी होगी, जिसके परिणामस्वरूप प्रभाव स्थाई होगा ।
ठण्डे पानीका शरीरपर अल्पकालीन प्रभाव –
१. शारीरिक तापमानको बढाता है ।
२. त्वचाकी कार्यशीलतामें वृद्धि करता है ।
३. रक्तचापको बढाता है ।
४. शरीरकी नाडियोंको उत्तेजित करता है ।
५. हृदयकी क्रियाशीलताको तीव्र एवं दृढ करता है ।
६. मांसपेशियोंको सङ्कुचित करता है ।
७. त्वचाके पासके रक्तकोषोंको अल्प समयके लिए सङ्कुचित करता है ।
८. पोषण शक्तिको बढाता है ।
९. श्वास क्रियाको मध्यम करता है ।
ठण्डे पानीका शरीरपर दीर्घकालीन प्रभाव –
१. शारीरिक तापमानको न्यून करता है
२. त्वचाकी कार्यशीलतामें ह्रास उत्पन्न करता है ।
३. रक्तचापको न्यून करता है ।
४. शरीरकी नाडियोंपर मृदु प्रभाव डालता है ।
५. हृदय गतिको दुर्बल करता है ।
६. त्वचाके पासके रक्तकोषोंको सङ्कुचित करता है ।
७. पोषण शक्तिको अल्प प्रभावित करता है ।
८. श्वास क्रियाको मध्यम करता है l
९. मांसपेशियोंको सङ्कुचित करता है।
१०. रोग प्रतिरोधात्मक शक्तिको बढाता है ।
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