यदि यह स्नान उचित रीतिसे किया जाए तो इसका प्रभाव शरीरके ऊपरी भागकी त्वचापर इतना अच्छा पडता है कि देखकर आश्चर्य होता है । कुछ दिनोंके पश्चात समूचा शरीर ‘मलमल’की भांति कोमल हो जाता है और त्वचापर एक प्रकारका आकर्षक लावण्य आ जाता है ।
विशेष : शुष्क घर्षणस्नानमें तेल या इसी प्रकारकी किसी अन्य वस्तुका भूलसे प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा इस स्नानके पश्चात शुद्ध एवं ठण्डे जलसे स्नान करना चाहिए । प्रातःकालीन धूपमें बैठकर शुष्कघर्षणका अभ्यास निश्चय ही उत्तम है । इससे शरीर शक्तिशाली होनेके अतिरिक्त उसे विटामिन ‘डी’की भी प्राप्ति हो जाती है, जो उत्तम स्वास्थ्य हेतु परमोपयोगी है ।
तेल मर्दन : शुष्क घर्षण स्नानके पश्चात दूसरा स्थान तेलस्नान अथवा तेल मर्दनका है । इसको तर मर्दनके नामसे भी जाना जाता है । इसमें शुद्ध सरसोंका तेल उपयोगमें लाना चाहिए । कहा जाता है सेरभर मांस या आधा सेर घी खानेसे शरीरको जो लाभ प्राप्त नहीं होता, वह एक छटांग शुद्ध सरसोंके तेलको शरीरमें मर्दनद्वारा सुखानेसे सहज ही प्राप्त हो जाता है । इस सम्बन्धमें लिखा है :
‘मासांद अष्टगुणं घृत घृताद अष्टगुणं
तैलं मद्र्दनात् नतु भक्षणात् । ‘ – आयुर्वेद
तेल सर्वप्रथम पांवोंमें मलना चाहिए, तत्पश्चात सिरमें, तत्पश्चात शरीरके अन्य अंगप्रत्यंगोंमें । नाभि, हाथ-पांवके नखों, दोनों कानों, नासिका एवं नेत्रोंके पपोटोंपर मर्दनके समय तेलका प्रयोग करना नहीं भूलना चाहिए । इससे आयुमें वृद्धि होती है । अनिद्रा रोग अथवा किसी प्रकारके रोगका आक्रमण शीघ्र नहीं होता और बुढापा (वृद्धावस्था) विलम्बसे आता है तथा सौन्दर्य और अक्षय स्वास्थ्यकी प्राप्ति होती है ।
त्वचाका रोग होनेसे सरसोंके तेलके स्थानपर तिलका तेल या नारियलका तेल प्रयोगमें लाया जा सकता है । शीशमें सरसोंके तेलके स्थानपर तिलका तेल प्रयोगमें लाया जा सकता है । तेलका मर्दन अधिकतर रोगियोंके लिए, अधिक उपयुक्त व हितकारी होती है ।
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