घरका वैद्य – नित्यकल्याणी ‘सदाबहार’ (भाग-३)
त्वचा रोगमें – ‘सदाबहार’का क्वाथ (काढा) बनाकर पीनेसे त्वचा विकारोंमें लाभ होता है ।
सङ्क्रमणके रोगमें – ‘सदाबहार” पत्तोंके सतका प्रयोग ‘स्ट्रेप्टोकोक्कस’ तथा ‘स्टेफाईलोकोकस’ जीवाणुओंके सङ्क्रमणकी चिकित्सामें किया जाता है ।
अर्बुद (ट्यूमर) – ‘सदाबहार’ मूलका चूर्ण या क्वाथका प्रयोग कर्कटार्बुद एवं रक्तार्बुदकी चिकित्सामें किया जाता है ।
‘सदाबहार’ पञ्चाङगका क्वाथ बनाकर प्रात: काल व सन्ध्याके समय सेवन करनेसे रक्तका शोधन होता है तथा अर्बुदमें (ट्यूमरमें) लाभ होता है । (पञ्चाङ्ग आयुर्वेदमें उसे कहते हैं जब किसी पौधेके पांचों अंग उपयोगमें लेने हों, ये पांच अंग मूल (जड), तना, पत्ती, पुष्प एवं फल हैं ।)
‘सदाबहार’ पञ्चाङग तथा सर्पगन्धा पञ्चाङगको समान मात्रामें मिलाकर क्वाथ (काढा) बनाकर पीनेसे अनिद्रामें लाभ होता है । इसके सेवनसे उच्च रक्तचाप तथा अवसादमें लाभ होता है ।
कीटदंश – ‘सदाबहार’ पत्र-स्वरसको दंशके स्थानपर लगानेसे कीटदंशजन्य विषाक्त प्रभावोंका शमन होता है ।
रक्तचापमें लाभप्रद – ‘सदाबहार’की जडमें ‘एजमेलिसिन’ और सर्पेन्टिन नामक क्षारभ (अल्कैलाइड) पाए जाते हैं, जो उच्च रक्तचापरोधी (Anti Hypertensive) होते हैं । ये उच्च रक्तचापके लिए अत्यन्त प्रभावशाली है । इसकी जडको स्वच्छ करके प्रातःकाल चबा-चबाकर खा लें, या दातुनकी भांति चबा चबाकर इसका रस पीते रहें और कुछ देर उपरान्त इसके अवशेषको फेंक दें ! इसके साथमें सर्पगन्धाकी जडका भी प्रयोग किया जा सकता है । दोनोंको मिलाकर लेनेसे इसका परिणाम और भी अच्छा होगा । यदि सर्पगन्धा न भी मिले तो भी केवल ‘सदाबहार’की जडका प्रयोग कर सकते हैं ।
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