घरका वैद्य – पारिजात पुष्प (भाग-१)


हिन्दू धर्म ग्रन्थोंमें देव वृक्षकी संज्ञासे शोभित दुलर्भ प्रजातिका ‘पारिजात’ वास्तवमें औषधीय गुणोंका भण्डार है । आयुर्वेदमें इस वृक्षके तनेसे लेकर शिखामें जटिल और असाध्य रोगोंके निदानका वर्णन किया गया है । अपनी सुन्दरता और विशेष गुणोंके कारण यह वृक्ष वर्षोंसे लोगोंके आकर्षण और कौतूहलका केन्द्र बना हुआ है । उत्तर प्रदेश शासनने इस वृक्षको संरक्षित घोषित किया है । राजधानी लखनऊ और बाराबंकीमें पारिजातके वृक्षको देखनेके लिए बडी संख्यामें लोग पहुंचते हैं । आयुर्वेदमें देव वृक्षको विशेष स्थान दिया गया है ।
पूर्व वैज्ञानिक एवं ज्योतिषके विशेषज्ञ गोपाल राजूके अनुसार धनकी देवी लक्ष्मीको प्रसन्न करनेमें पारिजात वृक्षका उपयोग किया जाता है । यह पूजा वर्षके पांच मुहुर्त होली, दीपावली, ग्रहण, रवि पुष्प तथा गुरु पुष्प नक्षत्रमें की जाए तो उत्तम है । पारिजात वृक्षके वे ही पुष्प उपयोगमें लाए जाते हैं, जो वृक्षसे टूटकर गिर जाते हैं अर्थात वृक्षसे पुष्प तोडनेका निषेध है । उन्होंने बताया कि वनस्पति शास्त्रियोंके अनुसार इस वृक्षकी आयु एकसे पांच सहस्र वर्षतक आंकी गई है । विश्वमें इस वृक्षकी केवल पांच प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमेंसे एक ‘डिजाहाट’ है । पारिजात वृक्ष इसी ‘डिजाहाट’ प्रजातिका है ।
सामान्यजन इसे प्राजक्ता हरसिंगार, शेफाली, शिउली आदि नामोंसे भी जानते हैं । इसका वृक्ष १० से १५ फुट ऊंचा होता है ।
यह सम्पूर्ण भारतमें होता है । यह बंगालका राजकीय पुष्प है ।
अन्य भाषाओंमें पारिजातके नाम : पारिजातका वानस्पतिक नाम निक्टैन्थिस् आर्बोर-ट्रिस्टिस् (Nyctanthes arbor-tristis Linn., Syn-Nyctanthes dentata Blume) है और यह ओलिएसी कुलसे है । हिन्दीमें इसे हरसिंगार, पारिजात, कूरी, सिहारु, सेओली; संस्कृतमें पारिजात, पुष्पक, प्राजक्त, रागपुष्पी, खरपत्रक; अंग्रेजीमें ट्री ऑफ सैडनेस, मस्क फ्लॉवर, कोरल जैसमिन, नाईट जैसमिन आदि नामोंसे जानते हैं ।


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