घरका वैद्य – रस चिकित्सा (भाग-१)


फल या रस चिकित्सा अर्थात फलों, मूलों, तनों, पत्तियोंके रसाहारद्वारा चिकित्सा । रस चिकित्सा एक ऐसी पद्धति है, जिसका कोई प्रतिकूल या अवाञ्छित प्रभाव (साइड इफेक्ट) नहीं है । रोगोंसे लडनेके लिए रसका उपयोग औषधिके समान किया जाता है । फलों और तरकारियोंमें जो पोषक तत्त्व पाए जाते हैं, वे हमें रोगोंसे प्रतिकार करनेकी शक्ति देते हैं ।
       रस चिकित्सा सिद्धान्तके अनुसार नूतन (ताजे) रसोंके स्वास्थ्यवर्धक गुण कई रोगोंके उपचारके लिए लाभदायक होते हैं । ‘ताजे’ फलों और तरकारियोंके (सब्जियोंके) रसमें स्वास्थ्यवर्धक गुण होते हैं और इन्हें प्राचीन कालसे कई रोगोंके उपचारके लिए प्रयोग किया जाता है । ‘ताजे’ फलों और तरकारियोंके रसोंके पोषण एवं जैव रासायनिक गुणोंको अब मान्यता मिल चुकी है । तरकारियों (सब्जियों) और फलोंके ‘ताजे’ रसमें प्राकृतिक रूपसे पाए जानेवाले पोषक तत्त्व जैसे विटामिन, खनिज और किण्वक (एंजाइम) प्रचुर मात्रामें होते हैं, जो कृत्रिम रासायनिक वटियोंसे (सिंथेटिक केमिकल गोलियोंसे) कई गुणा अधिक उपयुक्त होते हैं । ये पोषक तत्त्व रक्तमें अच्छेसे अवशोषित हो जाते हैं और कुछ ही मिनटोंमें ही वे शरीरकी कोशिकाओंको पोषण प्रदान करते हैं ।
   रोग निवारणकी दृष्टिसे ‘ताजा’ फल और तरकारी खानेसे अधिक उपयोगी उनका ‘ताजा’ रस पीना होता हैं; क्योंकि ठोस खाद्य पदार्थोंको शरीरकी पाचन तन्त्रसे गुजरना पडता है और इसमें कई घण्टे लग सकते हैं, इसके लिए एक स्वस्थ पाचन तन्त्रकी आवश्यकता है । रसोंसे पोषक तत्त्व द्रुतगतिसे और सरल रीतिसे अवशोषित होते हैं । इसके अतिरिक्त रस चिकित्सासे शरीरको पोषक तत्त्वोंकी बहुत उच्च मात्रा उपलब्ध होती है ।


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