घरका वैद्य – रस चिकित्सा (भाग-२)
रस-चिकित्साके लाभ
* रस-चिकित्सासे अनेक रोगोंका प्रतिकार किया जा सकता है ।
* कोई भी रोग होनेपर अशक्तता (कमजोरी) बढ जाती है, जिसमें भोजन सरलतासे खाया या पचाया नहीं जा सकता है, ऐसेमें हम रस चिकित्साको सरलतासे उपयोगमें ला सकते हैं, जिससे शारीरिक व मानसिक अशक्तताको दूर किया जा सकता है ।
* जिन खाद्य पदार्थोंसे रस निकाले जाते हैं, उन्हें उगाने हेतु किसी भी प्रकारके अधिक उर्वरककी (खादकी) आवश्यकता नहीं होती है । इस कारण इनकी गिनती जैविक खाद्य पदार्थोंमें (आर्गेनिक फूडमें) होती है । इनके जैविक होनेसे इनके रस अधिक पौष्टिक होते हैं ।
* रसाहारसे, ‘फास्टफूड’ तथा दूषित भोजनसे होनेवाले दोष नष्ट हो जाते हैं ।
* रसाहारसे जलकी न्यूनता (कमी) भी पूरी होती है तथा दूषित जलसे होनेवाले सभी रोगोंसे बचा भी जा सकता है ।
* रसाहारसे रक्त (लहू) स्वच्छ होता है, मूत्र अधिक होकर शरीरके विषाक्त तत्त्व बाहर निकलते हैं । रससे शरीरकी क्षतिग्रस्त कोशिकाओंको पुनर्निर्माणमें सहायता मिलती है ।
* फल या तरकारीका रस पीनेसे पाचन तन्त्रपर अधिक बल नहीं पडता और अधिकसे अधिक पोषक तत्त्वोंकी प्राप्ति होती है ।
रस पीते समय ध्यान रखने योग्य तथ्य :
* जब भी हम कोई पेय पीते हैं, हमें उसे धीरे-धीरे, मुखमें कुछ क्षण लारसे मिश्रितकर पीना चाहिए । यहांतक कि जल भी हमें धीरे-धीरे या घूंट-घूंट लेकर ही पीना चाहिए । इस प्रकार पीनेसे हमारे मुखमें उत्पन्न होनेवाली उष्णता भी शान्त हो जाती है तथा ये ठण्डक हमारे उदरतक (पेटतक) पहुंचती है । ऐसा करनेसे रक्त अधिक बननेकी क्षमता उत्पन्न होती है तथा रक्त संचार भी ठीकसे होता है ।
* रसाहारसे पहले फल तथा तरकारियोंके गुण-दोष अवश्य समझ लेने चाहिए । यह देखना चाहिए कि क्या वह फल या तरकारी हमारे लिए अनुकूल है अथवा नहीं ? साथ ही दोनोंके रसको पृथक-पृथक ही पिएं !
* रसको निकालनेके पश्चात उसे त्वरित पीना चाहिए । यदि आवश्यकता पडनेपर रसको रखना पडे तो ३५ से ३८ ‘डिग्री फारेनहाइट’ तापमानपर रखें ! इसे ‘कांच’के गहरे रंगकी बोतलमें रखें, जो उबलते पानीसे स्वच्छ की गई हो, इसका विशेष ध्यान रखें !
* रस आवश्यकतासे अधिक कभी नहीं लेना चाहिए । ऐसा इसलिए; क्योंकि अधिकांश रस अधिक अम्लीय होते हैं, जो शरीरकी प्राकृतिक अम्लताको बिगाड देते हैं ।
* बिना किसी रोगके भी १-२ ‘गिलास’ फल या तरकारीका रस प्रतिदिन पीना चाहिए ।
* आरम्भमें रसाहारकी मात्रा अल्प रखें, धीरे-धीरे मात्रा बढाएं ।
* प्रातः रसाहार करनेकी प्रक्रियामें रोगी निरन्तरता रखे तो उसके कष्ट शीघ्र न्यून हो जाएंगे ।
* रसाहारके रूपमें केवल फलों, तरकारियों और गेहूंके जवारेका ही उपयोग प्रचलित है, अन्य सभी वनौषधियोंके रसोंको आयुर्वेदके अन्तर्गत माना गया है ।
* सामान्यतः गेहूंके जवारे, गिलोय, ग्वारपाठा, शीशम, पीपल, अदरक, कडवी नीम, मीठी नीम, बेलपत्र, अडूसा, अपामार्ग, गेंदेके फूल या पौधेकी पत्तियां, हरसिंगार, पुदीना, पान, अगिया, पर्णबीज, मुलैठी, हलदी, आंवला, मकोय, सहजन, मेथी, मूली, पालक, टमाटर, मेथा, गुडमार, तुलसी, निर्गुण्डी, अमलतास, हडजोड, जामुन आदिका रसाहार चिकित्सा पद्धतिमें प्रयोग होता है ।
* सामान्यतः जो पेड-पौधे जिस ऋतुमें सरलतासे उपलब्ध होते हैं, उसी ऋतुमें मानव शरीरको उसकी आवश्यकता होती है; इसलिए जबतक ऋतु अनुकूल फल मिलें, तबतक उसका सेवन करें । उसके पश्चात उनके चूर्णका उपयोग करना चाहिए ।
* शीतऋतु (सर्दी) आते ही आंवलेका उपयोग आरम्भ हो जाता है । कार्तिक माहसे कच्ची हलदीका उपयोग होता है । इसका उपयोग वसन्त पंचमी या होलीतक होता है । भुई आंवला (भूमि आंवला) वर्षा ऋतुमें आता है । ग्वारपाठा, गेहूंके जवारे, नारियल-पानी आदिका प्रयोग सम्पूर्ण वर्ष होता है ।
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