घरका वैद्य – स्वर चिकित्सा (भाग-१)
एक शास्त्र वचन अनुसार, ‘कायानगर मध्ये तु मारुत क्षिति पालक’ अर्थात देहरूपी नगरमें वायु राजाके समान है । शरीरद्वारा वायु ग्रहण करनेका नाम ‘निःश्वास’ और वायु त्यागनेका नाम ‘प्रश्वास’ है । जीवके जन्मसे मृत्युतक ये दोनों क्रियाएं निरन्तर चलती रहती हैं । कभी यह बाईं ओरसे चलती है, कभी दाईं ओरसे तो कभी दोनों ही नासिकाओंसे । स्वरके चलनेकी क्रियाको उदय होना मानकर ‘स्वरोदय’ कहा गया है तथा विज्ञान, जिसमें कुछ विधियां बताई गई हों और विषयके रहस्यको समझनेका प्रयास हो, उसे विज्ञान कहा जाता है । वैसे तो स्वरोदय विज्ञान एक सरल प्रणाली है और यदि कोई जिज्ञासु इस शास्त्रका गम्भीरतासे अभ्यास कर ले तो वह स्वयंका एवं अन्योंका भी, इसके माध्यमसे कल्याण कर सकता है । वस्तुतः प्रत्येक श्वास लेनेवाला जीव यह प्रयोगमें ला सकता है । इस शास्त्रके अनुसार, श्वासोंमें गडबडी उत्पन्न होनेपर अनेक रोग जन्म लेते हैं ।
व्यक्तिको व्यवहारमें अनेक कार्य करने होते हैं । स्वरके परिवर्तित होनेतक वह बैठा नहीं रह सकता; इसलिए नासिकाद्वारा चलनेवाली वायुकी गति सीख लेना आवश्यक है । व्यक्तिको अपनी इच्छानुसार श्वासकी गति परिवर्तित करना सीख लेना चाहिए । इसे ही स्वरोदय विज्ञान कहते हैं और यह अपने आपमें एक पूर्ण विज्ञान है । इसके ज्ञान मात्रसे ही व्यक्ति, अनेक लाभोंसे लाभान्वित होने लगता है । इसका लाभ प्राप्त करनेके लिए आपको कोई कठिन गणित, साधना, यन्त्र-जप, उपवास या कठिन तपस्याकी आवश्यकता नहीं होती है । आपको केवल श्वासकी गति और दिशाकी स्थिति ज्ञात करनेका अभ्यास मात्र करना होता है एवं थोडी लगन एवं आस्थासे इसका अध्ययन या अभ्यास किया जाए तो जीवनपर्यन्त इसके असंख्य लाभोंसे अभिभूत हुआ जा सकता है । योगमें श्वासको प्राण कहा गया है एवं स्वरोदय शास्त्रके अनुसार श्वास लेनेकी विधिमें व्यक्तिके स्वस्थ और रोगी होनेका रहस्य छुपा है । उचित समयपर योग्य मात्रामें श्वास लेनेवाला व्यक्ति रोगसे बचा रहता है ।
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