घरका वैद्य – स्वर चिकित्सा (भाग-२)


दांए नथुनेसे निकलनेवाली सांस पिंगला है । इस स्वरको सूर्य स्वर कहा जाता है । यह उष्ण (गर्म) होती है । जबकि बाईं ओरसे निकलनेवाले स्वरको ‘इडा’ नाडीका स्वर कहा जाता है । इसका सम्बन्ध चन्द्रसे है और यह स्वर ठण्डा होता है ।
  रावण संहितामें स्वर विज्ञानके सम्बन्धमें बृहद जानकारी दी गई है । यद्यपि यह अधिकांशतः प्रश्नकर्ताद्वारा प्रश्न पूछे जानेपर ज्योतिषीद्वारा ध्यानमें रखे जानेवाले बिन्दुओंपर केन्द्रित है; किन्तु किसी सामान्य जातकके लिए भी ये तथ्य उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं । चन्द्रमा एवं सूर्यकी रश्मियोंका प्रभाव स्वरोंपर पडता है । चन्द्रमाका गुण शीतल एवं सूर्यका उष्ण है । शीतलतासे स्थिरता, गम्भीरता, विवेक आदि गुण उत्पन्न होते हैं और उष्णतासे तेज, शौर्य, चंचलता, उत्साह, क्रियाशीलता, बल आदि गुण उदित होते हैं । किसी भी कार्यका अन्तिम परिणाम उसके आरम्भपर निर्भर करता है । शरीर व मनकी स्थिति, चन्द्र व सूर्य या अन्य ग्रहों, तिथि एवं नाडियोंका भलीभांति अभिज्ञानकर (पहचान) यदि कार्य आरम्भ करें तो परिणाम अनुकूल निकलते हैं ।
स्वरोदय विज्ञानके अनुसार सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवारको यदि बायां स्वर अर्थात बाईं नासिकासे स्वर चल रहा हो तो यह श्रेष्ठ होता है । इसी प्रकार यदि मंगलवार, शनिवार और रविवारको दायां अर्थात दाईं नासिकासे स्वर चल रहा हो तो इसे श्रेष्ठ बताया गया है । यदि स्वर इसके प्रतिकूल हो तो
* रविवारको शरीरमें वेदना अनुभव होगी ।
* सोमवारको कलहका वातावरण मिलेगा ।
* मंगलवारको मृत्यु और दूर देशोंकी यात्रा हो सकती है ।
* बुधवारको राज्यसे आपत्ति होगी ।
* गुरु और शुक्रवारको प्रत्येक कार्यकी असिद्धि होगी ।
* शनिवारको बल और खेतीका नाश होगा ।
सवेरे नींदसे जागते ही नासिकासे स्वर देखें ! जिस तिथिको जो स्वर होना चाहिए, वह हो तो शैयापर (बिस्तरपर) उठकर स्वरवाले नासिका छिद्रकी ओरके हाथकी हथेलीका चुम्बन ले लें और उसी दिशामें मुंहपर हाथ फिरा लें ! यदि बाएं स्वरका दिन हो तो ‘बिस्तर’से उतरते समय बायां पांव भूमिपर रखकर नीचे उतरें, उसके पश्चात दायां पांव बांयेसे मिला लें, इसके उपरान्त पुनः बायां पांव आगे निकालकर आगे बढें ! यदि दाएं स्वरका दिन हो और दांया स्वर ही निकल रहा हो तो बिछावनपर उठकर दाईं हथेलीका चुम्बन ले लें, उसके पश्चात भूमिपर पांव रखते समय पहले दायां पांव भूमिपर रखें और आगे बढें ! यदि जिस तिथिको जो स्वर हो, उसके विपरीत नासिकासे स्वर निकल रहा हो तो बिछावनसे नीचे नहीं उतरें और जिस तिथिका स्वर होना चाहिए उसके विपरीत करवट लेटें ! इससे जो स्वर चाहिए, वह आरम्भ हो जाएगा और उसके पश्चात ही बिछावनसे नीचे उतरें !


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