घरका वैद्य – स्वर चिकित्सा (भाग-५)
असाध्य रोगोंके रोगियोंके उपचारमें स्वर परिवर्तनके साथ अपने आराध्यका या रोग निवारण निमित्त विशिष्ट मन्त्रका जप करनेसे अच्छे परिणाम आते हैं; क्योंकि कष्टका कारण मात्र शारीरिक नहीं, वरन आध्यात्मिक भी होता है । जपकी तरंगोंके प्रवाहसे न केवल आसपासका वातावरण ही शुद्ध होता है; अपितु रोगीके स्वरका भी शोधन होने लगता है, जिससे उसके स्वास्थ्यमें लाभ होता है ।
आसन, प्राणायाम, स्वाध्याय, प्रार्थना, जप-ध्यान, दोष निर्मूलन एवं सत्सेवासे शरीरमें सूक्ष्मसे निर्माण होनेवाली काली शक्तिका विघटन होता है अर्थात ऐसा करनेसे शरीर एवं सूक्ष्म देहोंका आन्तरिक शोधन होकर पवित्रता निर्माण होती है, जिससे आभामण्डल शुद्ध होता है, श्वासकी गति मन्द होती है, इससे स्वर सन्तुलित होने लगता है; अतः व्यक्तिका स्वास्थ्य अपेक्षाकृत अच्छा रहता है । शरीरके विभिन्न आसनों, मुद्राओं एवं वन्दना, ध्यान, जप, प्रार्थनासे स्वर नियमित चलने लगते हैं, जिससे प्रत्येक कार्य व्यवस्थित होनेकी सम्भावनाएं बढ जाती हैं ।
कौनसा स्वर कब लाभप्रद अथवा हानिकारक ?
‘शिव स्वरोदय’में कौनसा कार्य कब और किस स्वरमें करना है ?, इस हेतु विस्तृत विवेचन किया गया है, जिससे प्रतिकूलताओंसे यथासम्भव बचा जा सके एवं अपनी क्षमताओंका अधिकतम उपयोग किया जा सके ।
* घरसे बाहर जाते समय जो स्वर चल रहा हो, उसी ओरके पांवको पहले भूमिपर रखना चाहिए; परन्तु बाहर यात्रापर जाते समय चन्द्र स्वरमें ही यात्रा प्रारम्भ एवं सूर्य स्वरमें घरमें प्रवेश करना श्रेयस्कर होता है ।
* यदि शुक्ल पक्षकी द्वितीयाके दिन सूर्यास्तके समय चन्द्र स्वर सहजतासे चलता हो तो वह पक्ष उस व्यक्तिके लिए अत्यन्त कल्याणकारी होता है । यदि कृष्ण पक्षकी प्रतिपदाको सूर्योदयके समय सहज रूपसे सूर्य स्वर चलता है तो वह व्यक्तिके अच्छे स्वास्थ्यका सूचक होता है, जबकि शुक्ल पक्षकी प्रतिपदाको सूर्योदयके समय सूर्य स्वर चलता हो तो उस व्यक्तिका स्वास्थ्य प्रायः अच्छा नहीं होता है ।
* चन्द्र स्वर सभी शुभ एवं स्थायी कार्योंके लिए श्रेष्ठ होता है, जबकि सभी क्रूर, साहसी एवं शक्तिप्रधानवाले कार्य सूर्य स्वरमें शीघ्र फलदायक होते हैं ।
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