घरका वैद्य – प्राणायाम चिकित्सा – उज्जायी प्राणायाम (भाग-२)
उज्जायी प्राणायाम करनेकी विधि : इसमें दोनों नासिकाओंसे धीरे-धीरे सांस ली जाती है और जब सांस छोडी जाती है तो दाईं नासिकाको बन्दकर बाईं नासिकासे श्वासको धीरे-धीरे निकाला जाता है । जब दोनों नासिकासे श्वास ली जाती है तो गर्दनके ‘थाइराइडवाले’ भागको कम्पन कराके ‘ॐ’की ध्वनि उत्पन्न की जाती है । यह ध्वनि उज्जायी प्राणायामकी विशिष्टता है । यह श्लेष्माके (बलगमके) कारण होनेवाले गलेके रोगोंको दूर करता है और जठराग्निको बढाता है । – हठप्रदीपिका (२:५१,५२)
उज्जायी प्राणायामको तीन पद्धतियोंसे किया जा सकता है और इन्हें पूरे चक्रके साथ नीचे बतानेका प्रयास किया गया है ।
१. उज्जायी प्राणायामको बैठकर कैसे करें ?
* सबसे पहले आप किसी समतल और स्वच्छ भूमिपर आसन बिछाकर उसपर पद्मासन, अर्द्ध पद्मासन या सुखासनकी अवस्थामें बैठ जाएं !
* अब अपने दोनों नासिका छिद्रोंसे श्वासको भीतरकी ओर खीचें, इतना खींचे कि श्वास फेफडोंमें भर जाए, श्वासको धीरे-धीरे खींचे, एक साथ श्वास कभी नहीं खींचनी चाहिए ।
* इसके पश्चात वायुको, जितना हो सके, अपने फेफडोंके भीतर रोकें । इस प्रक्रियाको आन्तरिक कुम्भक कहते हैं ।
* अब अपनी नाकके दाएं छिद्रको बन्द करके नासिकाके बाएं छिद्रसे श्वासको बाहर निकालें !
* अब वायुको भीतर खींचते और बाहर छोडते समय, कण्ठको संकुचित करते हुए ध्वनि करेंगे, जैसे हलके खर्राटोंके समान या समुद्रके पास जो ध्वनि आती है, उसके समान ।
* अब इसी क्रियाको आप नासिकाके बाएं छिद्रको बन्दकर दोहराएं; इसे १०-१२ मिनटतक कर सकते हैं ।
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