गुण ही व्यक्तिको श्रेष्ठ बनाते हैं


ज्येष्ठत्वं जन्मना नैव गुणैज्र्येष्ठत्वमुच्यते ।
गुणात् गुरुत्वमायाति दुग्धं दधि घॄतं क्रमात् ।।

अर्थात्  जन्मसे श्रेष्ठता नहीं आती है, महानता सदगुणोंको आत्मसात करनेसे आती है । गुणोंमें बढोतरीके कारण श्रेष्ठतामें उत्तरोत्तर प्रभाव वैसे ही बढता है जैसे दुग्धसे दहीका और दहीसे मक्खन और घीका ! हमारे यहांके वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित नहीं अपितु गुण-कर्म आधारित थी और एक ही जन्ममें अपने दोषोंका निराकरण एवं गुणोंका संवर्धन कर, साधनारत होकर, कोई भी व्यक्ति उत्तरोतर वर्णमें मार्गक्रमण कर सकता था, यह शास्त्रवचन इसकी पुष्टि करता है; इसीलिए उपनिषदके कुछ भाष्यकार या रचियता पूर्वमें वर्णसे क्षत्रिय थे एवं साधना कर वे ब्राह्मण वर्णको प्राप्त हुए । क्या इतनी सुन्दर व्यवस्था अन्य किसी धर्म और पन्थमें है ? तब भी मूढ हिन्दू जात-पातको लेकर आपस में लडते रहते हैं !



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution