गुरुकृपासे कुछ भी सम्भव है । जब मैं १९९७ में सनातन संस्थासे मुम्बईमें जुडी तो हिन्दी भाषिक होनेके कारण अपने श्रीगुरुके मराठी ग्रन्थ एवं मराठी दैनिक और साप्ताहिक सनातन प्रभात नहीं पढ पाती थी । अनेक बार जब भी कोई नूतन ग्रन्थ मराठीमें प्रकाशित होता और मैं उसे पढ नहीं सकती, यह सोचकर मेरे नेत्रोंसे अश्रु बहने लगते थे । कभी-कभी अपने श्रीगुरुसे मन ही मन लडती भी और उन्हें उलाहना भी देती कि आपने ही इस सृष्टिमें मेरे जन्मका नियोजन किया तो आपने मुझे मराठी क्यों नहीं बनाया ?, कमसे कम मैं आपके साहित्योंको तो पढ पाती, मेरे किस पापकर्मके कारण आप मुझे अपने दिव्य ज्ञानसे वंचित रखा है ? एक वर्ष पश्चातसे ही धर्म प्रसाकी सेवा अन्तर्गत उत्तर भारतका हिन्दी भाषिक भाग मेरा कार्यक्षेत्र रहा और मराठी साधकोंके सम्पर्कमें अत्यल्प रहनेसे मैं मराठी भाषा सीख नहीं पाई । वर्ष २००६ में एक दिवस पुनः मैं सनातनके पनवेलके देवद आश्रममें मराठी दैनिक हाथमें लेकर रो रही थी । कुछ समय पश्चात ऐसा लगा जैसे श्रीगुरुने मेरा अश्रुपूर्ण निवेदन स्वीकार कर लिया और जब मैंने पुनः उस दैनिकको देखा तो मैं उसे अच्छेसे समझ सकती थी । उसके पश्चात मुझे अकस्मात मराठीके ग्रन्थ समझमें आने लगे । मैं मराठी बोल नहीं सकती; किन्तु जब कोई साधक उसे मराठीसे हिन्दीमें भाषान्तरित कर भेजते हैं तो मैं उसकी मराठी भाषासे देखकर भाषान्तरणके मध्य हुई चूकोंको सुधार देती हूं, सचमें गुरुकृपासे सब कुछ सम्भव है ! ऐसे गुरु तत्त्वको नमन है !
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