गीता सार


यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते ।
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥
अर्थ : ज्ञान योगियोंद्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंद्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोगको फलरूपमें एक देखता है, वही यथार्थ देखता है | – श्रीमदभगवद्गीता (५ : ५ )
भावार्थ : सनातन धर्मका एक मूलभूत सिद्धान्त है – जितने व्यक्ति उतनी प्रकृतियां और उतने ही उतने साधना मार्ग | ईश्वरप्राप्ति हेतु वैदिक सनातन धर्म अनुसार अनेक साधना मार्ग है जिन्हें हम योगमार्ग भी कहते हैं | इन सभी योगमार्गोंसे हम मोक्ष रूपी ध्येयको साध्य कर सकते हैं | प्रत्येक व्यक्ति अपने आपमें भिन्न है क्योंकि प्रत्येक व्यक्तिका संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण कर्म, पंचतत्त्वका अनुपात, पंचमहाभूतका अनुपात सब भिन्न भिन्न होता है, साथ ही सभीका स्वभाव भी भिन्न होता है अतः प्रत्येक व्यक्तिका साधना मार्ग भिन्न हो सकता है इस तथ्यका प्रतिपादन सनातन धर्मकी व्यापकता और विशिष्टीकरणको दर्शाता है | चाहे कोई कर्मयोगसे साधना करे, कोई ज्ञानयोगसे करे, कोई भक्तियोग या कोई अन्य मार्गसे साधना करे, वह उसी परमेश्वरसे एकरूप होता है | इस श्लोकमें भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट रूपसे यह बता रहे हैं कि ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनोंद्वारा उस परमधामको प्राप्त किया जा सकता है और जो इस तथ्यको स्वीकार करता है वह यथार्थको देख सकता है अर्थात भिन्न योगमार्गसे साधना करनेवालेके प्रति सम्मानका भाव रखना चाहिए |

-तनुजा ठाकुर



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