हमारा रसोईघर एक आयुर्वेदिक तत्त्वज्ञानसे भरपूर शोधशाला है (भाग – ४)
भारतीय व्यंजनकी कल्पना बिना मसालोंके की ही नहीं जा सकती है ! कश्मीरसे कन्याकुमारी और कच्छसे अरुणाचल प्रदेश तक भारतका सिया एक भी राज्य नहीं है जहां मसालोंका उपयोग रसोई घरमें न होता हो ! ये मसाले भोज्य पदार्थोंके स्वाद तो बढाते ही हैं साथ ही इनके अनेक औषधीय लाभ भी हैं ! हमारे भारतकी गृहिणियां भिन्न पकवानमें भिन्न मसालोंका उपयोग कुछ विशेष कारणसे करती हैं !
वस्तुत: इनका उचित ढंगसे प्रयोग हमारा अनेक गम्भीर रोगोंसे रक्षण करता है । इसलिए अब विदेशी भी इन मसालोंका उपयोग करने लगे हैं तो आइए, हम आपको कुछ मुख्य मसालोंके लाभके विषयमें संक्षेपमें बताते हैं –
१. हल्दी – हल्दीमें एक विशेष प्रकारका उडनशील तेल होता है, जिसमें ‘करक्यूपिन’ नामक तत्त्व होता है, जिसमें धमनियोंमें जमे पित्तसान्द्रवको (कॉलैस्ट्रोलको) घोलनेकी शक्ति होती है । इसके अतिरिक्त इसमें क्षारीय तत्त्व ‘कर्कुमिन’ होता है, जो कर्करोगको (कैंसरको) रोकनेमें सहायक होता है । शरीरमें किसी भी प्रकारकी वेदना, चोट, रक्त अल्पता रोगोंमें हल्दी प्रभावशाली होती है । गर्म दूधमें हल्दी डालकर पीनेसे टूटी हुई अस्थि (हड्डी) तीव्रतासे जुडती है ।
२. जीरा – जीरा भोजनके पाचनमें सहायक होता है, वायु (गैस) बननेसे रोकता है । कच्चा जीरा पीसकर इसमें समान मात्रामें गुड मिलाकर तथा इसकी गोली बनाकर दिनमें तीन बार पानीके साथ लेनेसे स्त्रियोंकी गर्भाशय पीडा व योनिकी सूजन दूर होती है । छाछमें भुना जीरा डालकर पीनेसे अतिसार (दस्त) ठीक होते है।
३. धनिया – यह भोजनके पाचनमें सहायक है । इसकी प्रकृति शीतल होती है । यह अम्लता, मूत्रकी जलन आदिमें लाभप्रद है । ग्रीष्म ऋतुमें दो गिलास जलमें ५ चम्मच साबुत धनिया दो कप पानीमें रात्रिमें भिगो दें और प्रातःकाल छानकर पी लें, इससे नकसीर, अर्शरोगमें (बवासीरमें) लाभ मिलेगा ।
४. लवंग (लौंग) – लौंगके रोगाणुरोधी (ऐन्टिसैप्टिक) गुण सडनको रोककर संक्रमण दूर रखते है । लौंग मुखकी दुर्गन्ध, अम्लता आदि दूर करती है तथा पाचन शक्ति बढाती है । पानीमें लौंग उबालकर पीनेसे ज्वरके पश्चात होनेवाले पाचन सम्बन्धी रोग दूर होते हैं ।
५. दालचीनी – इसमें प्राकृतिक रूपसे शर्करा पाई जाती है, जो मधुमेहके रोगियोंके लिए लाभप्रद होती है । यह रक्तचापको स्थिर रखती है, साथ ही पित्तसान्द्रवकी (कोलेस्ट्रॉलकी) समस्या, कर्करोग, योनि खमीर संक्रमण सदृश रोगोंको दूर करनेमें सहायक है ।
६. काली मिर्च – यह शीतप्रकोपसे रक्षा करती है। मलेरिया आदि ज्वरमें यह लाभदायक है । यह भूख बढाती है व पाचनमें सहायक होती है । दो-दो काली मिर्च दिनमें तीन बार मुखमें रखकर धीरे धीरे चूसनेसे खांसी ठीक हो जाती है ।
७. राई – इससे उदरके (पेटके) कृमि (कीडे) नष्ट होते हैं, वायु (गैस) नहीं बनती व पाचनमें सहायक होती है । छाछमें राईका छोंक लगाकर पीनेसे अतिसार (दस्त) ठीक होते हैं । इसकी प्रकृति उष्ण होती है तो यह सावधानीपूर्वक ही प्रयोग करनी चाहिए ।
८. अजवाइन – अजवाइन पेटमें मरोड तथा अफारा ठीक करती है, साथ ही यह उदरके (पेटके) कृमि (कीडे) नष्ट करती है, मांका दूध बढाती है तथा शीतप्रकोपमें लाभ देती है ।
९. मेथी – मेथी वायु विकारको मिटाती है, मधुमेह तथा जोडोंकी वेदना ठीक करती है । इसके अतिरिक्त यह पाचन शक्ति बढाती है तथा दहीमें मिलाकर बालोंपर लगानेसे बालोंको अच्छा करती है । मेथीसे ‘विटामिन-ए’ , ‘कैल्शियम’, लौहतत्व, पोटैशियम आदि मिलते हैं । इसकी प्रकृति उष्ण होती है ।
इसलिए स्त्रियोंने पारंपरिक भोजन बनाने चाहिए एवं उसे अपनी अगली पीढीको सिखाना चाहिए जो आज सामान्यत: नहीं हो रहा है !
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