
आजकलके समाचार वाहिनियोंमें हिन्दी भाषामें समाचार सुनते समय, भाषामें उर्दू शब्दके प्रयोगकी प्रचुरतासे लगता है, जैसे वह भारतके हिन्दू बहुल देशसे नहीं अपितु किसी मुसलमानी देशसे प्रसारित हो रही हो । हन्दी भाषाकी सात्त्विकताका हरण करनेमें इस देशके प्रत्येक क्षेत्रके व्यक्तिने अपनी भूमिका निभाई है और सबसे क्षोभका विषय यह है कि हिन्दी भाषाके शुद्धिकरण हेतु बुद्धिजीवीयों एवं साहित्यकारोंसे योग्य दिशामें प्रयत्न नहीं हो रहे हैं । कविगोष्ठीसे लेकर चित्रपटकी गीतों तक, सबमें तमोगुणी उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाका वर्चस्व स्पष्ट दिखाई देने लगी है । मैकालेकी निधर्मी शिक्षण प्रणालीसे उपजे आजके बुद्धिजीवीयोंको सात्त्विकता किसे कहते हैं, इसका उन्हें अंशमात्र भी भान नहीं रहा, इससे बडी विडम्बना, इस सत्त्वगुण आधारित वैदिक संस्कृतिकी और क्या हो सकती है ? – तनुजा ठाकुर
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