धर्मकी पुनर्स्थापना हेतु इसमें होनेवाले अनाचारको मान्य करना है अति आवश्यक


कुछ हिन्दू परिचित कहते हैं कि आप हिन्दू धर्ममें होनेवाले अनाचार सार्वजनिक रूपसे न लिखें, इससे हमें लज्जा आती है और ऐसा करनेसे हमारा धर्म निर्बल हो जाएगा । हिन्दुओंको यदि सबल और सशक्त बनना है तो उन्हें अपने धर्म अन्तर्गत होनेवाली धर्मग्लानिके कारणोंको स्वीकार करना ही होगा और तत्पश्चात ही उसमें सुधार करना सम्भव होगा । बाह्य और आन्तरिक कारणोंसे हो रही धर्मग्लानिको जो हिन्दू स्वीकार नहीं कर सकता, वह धर्मका रक्षण कभी नहीं कर सकता । अपने अन्दरके दोषोंको स्वीकार करनेमें लज्जा कैसी ? कुछ तो दोष हैं ही हममें, अन्यथा १०० कोटिसे अधिककी जनसंख्या होते हुए भी हिन्दू इस देशमें द्वितीय श्रेणीके नागरिकों समान क्यों जी रहा है ?



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