जिन्हें योग्य और अयोग्य, धर्म और अधर्मके मध्य भेद करना नहीं आता है, वे बुद्धिजीवी कहलानेके अधिकारी नहीं होते हैं एवं जो योग्य और अयोग्य, धर्म और अधर्मके मध्य भेद कर सके, हमारी वैदिक संस्कृतिमें ऐसे विवेकशील मनुष्यको ही पंडित या बुद्धिजीवी कहा गया है ! आजके ‘पढे-लिखे मूढ’ जो देशद्रोहको अभिव्यक्तिकी स्वतन्त्रता कहते हैं, वे बुद्धिभ्रष्ट कहलानेके अधिकारी होते हैं ! निधर्मी मैकालेकी शिक्षण पद्धतिके कारण ऐसे बुद्धिभ्रष्टोंकी संख्यामें भारी वृद्धि हुई है ! ऐसे बुद्धिभ्रष्टोंको मात्र दण्डितकर ही सुधारा जा सकता है; क्योंकि बुद्धि तामसिक हो जानेके कारण उन्हें बौद्धिक ज्ञान देना, समय व्यर्थ करने समान है ! वैदिक शिक्षण पद्धतिको शीघ्र लागू करनेसे इस प्रजातिके नूतन जीवोंका जन्म नहीं होगा, इस हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना ही एकमात्र पर्याय है !
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