आजके तथाकथित धर्मद्रोही बुद्धिवादियोंके मानवतावादका ढोंग एवं समस्याओंके निवारण हेतु उनके अधर्मी सुझाव !!
धर्म और अध्यात्म के ज्ञानसे विरहित कुछ तथाकथित धर्मद्रोही बुद्धिवादियोंका मत है कि धार्मिक कृत्यों या कर्मकांडमें धनका अपव्यय न कर उस धनसे निर्धनोंको भोजन कराना चाहिए !!! किसी समस्याका मूल कारण जानें बिना उसका निराधार एवं धर्मद्रोही सुझाव देनेवालोंको सर्वप्रथम यह जानना आवश्यक है कि मनुष्य दरिद्र क्यों होता है ! हमारा शास्त्र कहता है कि ‘अधर्म एवं मूलं सर्व रोगणाम् ‘अर्थात इस जन्म या पिछले जन्म किए गए अधर्म ही हमारे दुखोंका मूल कारण है ! नास्तिकताका पोषण करनेवाले समाजवाद और मार्कस्वाद जो सभीको समान अधिकार देनेके सिद्धान्तका डंका पीटता था उसके सर्व आदर्श विकसित राष्ट्रोंमें खोखले सिद्ध हुए और उस सामाजिक धारणाको पोषण करनेवाली राज्य प्रणालीको निरस्त कर दिया गया !
दरिद्रताका व्यष्टि कारण है अकर्मण्यता एवं पूर्व जन्मोंके पापोंका प्रतिफल और समष्टि कारण है नास्तिक अहिन्दु राज्य प्रणाली एवं समाजका धर्मसे विमुख होना !!
सर्वप्रथम किसी समस्याका मूल कारणको जानना चाहिए और उसके पश्चात उस कारणको दूर करनेके उपाय हेतु ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’के भावसे संगठित रूपसे उसके निदान हेतु प्रयास करना चाहिए।
इस समाजमें चाहे कितने भी धनाढ्य व्यक्ति हों दरिद्रता या दुखका कोई और कारण समाजमें सदैव विद्यमान रहनेवाला है क्योंकि प्रत्येक जीवात्माको अपने पापोंका कर्मफल भोगना पडता है यह इस सृष्टिके कर्मसिद्धांत है परंतु यदि हम उस जीवात्माको साधना करने हेतु प्रेरित करें तो उसके कर्मफलकी तीव्रता अल्प होकर उसमें प्रारब्द्ध भोगनेकी क्षमता निर्माण होती है और योग्य उद्यम कर ईश्वरीय कृपा प्राप्त होनेपर उसे प्रारब्ध अनुरूप भोजन भी सहज प्राप्त होता है ! ईश्वरका कोई भक्त भूखे मृत्युको प्राप्त हो गया हो यह आज तक नहीं हुआ है परंतु मैकालेकी शिक्षण पद्धतिसे उपजी नास्तिक बुद्धिभ्रष्ट व्यक्ति मात्र सतही स्तरपर किसी भी समस्याका अवलोकन कर उसका नास्तिक , अदूरदर्शी , धर्मविरुद्ध एवं हास्यास्पद उपाय बताते हैं !
समष्टि स्तरपर दरिद्रताको दूर करने हेतु धर्म सापेक्ष वैदिक सनातन धर्म आधारित राष्ट्र प्रणालीकी स्थापना करना सभी समस्याओंको मूल रूप दूर करनेका एकमात्र उपाय है , जहां राजा धर्मपालक होगा , प्रजा धर्माचरणी होगी एवं सर्वत्र सुख समृद्धि विद्यमान रहेगा ! -तनुजा ठाकुर (२४.२.२०१४)
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