मेरे कुछ हिन्दु मित्र कहते हैं कि आप हिन्दु धर्ममें होनेवाले अनाचार सार्वजनिक रूपसे न लिखें इससे हमें लज्जा अनुभव होती है और ऐसा करनेसे हमारा धर्म निर्बल हो जाएगा !! हिंदुओंको यदि सबल और सशक्त बनना है तो उसे अपने धर्म अंतर्गत होनेवाली धर्मग्लानिके कारणको स्वीकार करना ही होगा और तत्पश्चात ही उसमें सुधार करना संभव होगा ! बाह्य और आंतरिक कारणोंसे हो रहे धर्मपर आघातको जो हिन्दु स्वीकार नहीं कर सकता वह धर्मका रक्षण ही नहीं कर सकता !! अपने अंदरको दोषोंके स्वीकार करने में लज्जा कैसी ! कुछ तो कमी है ही हममें तभी तो ९० करोडसे अधिककी जनसंख्या होते हुए भी हिन्दु इस देशमें द्वितीय क्रमांकके नागरिक समान जी रहा है !-तनुजा ठाकुर
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