उत्तर बडा सरल है – “राष्ट्र हम साधकोंका होगा तो नियम भी हम ही बनाएंगे, अमेरिका और ब्रिटेनवालोंको लाकर थोडे ही नियम बनाने दिए जाएंगे ! और नूतन नियम बनानेकी आवश्यकता ही क्या है ?, हमारे धर्मशास्त्रोंमें सर्व नियम पहलेसे ही हैं, हमें तो मात्र उनके पालन करने और करवानेकी आवश्यकता है ।
भारत सदैव ही एक स्वयम्भू हिन्दू राष्ट्र रहा है, मात्र पिछले एक सहस्र वर्षोंके आसुरी आक्रमणने और हिन्दुओंकी अकर्मण्यता व स्वार्थलोलुपताने इसके इस तेजस्वी स्वरूपको धूमिल कर दिया और स्वतन्त्रताके पश्चात तो निधर्मी राज्यकर्ताओंने विदेशियोंका अनुकरणकर, इसका सत्यानाश ही कर दिया है ।
हिन्दू राष्ट्रमें हमें अपनी प्राचीन सामाजिक और राष्ट्रीय प्रणालीको मात्र पुनर्जीवित करना है, नूतन विधान या नियम बनानेकी कोई आवश्यकता ही नहीं है ।
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