जब ढोंगी गुरु, अत्याचारी एवं भ्रष्टाचारी राज्यकर्ता, भोग करनेकी प्रवृत्ति करनेवाली प्रजाकी भरमार हो जाये तो समझ लें कि कलियुगका चरम आ गया ! जब गुरु त्याग और धर्मकी प्रतिमूर्ति लगे, उनकेद्वारा सर्वत्र निःशुल्क धर्म-शिक्षण दिया जाये, राजा प्रजा हितके विचारसे सर्व कार्य करे और प्रजाके लिए भोग नहीं अपितु योग अर्थात साधना प्रधान हो तो उस युगको सतयुग कहते हैं -तनुजा ठाकुर
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