संस्कृतमें एक सुवचन है – ‘वचनं किं दरिद्रता’ अर्थात् वचनसे भला क्यों दरिद्र बनें ! आज अधिकांश हिंदुओंकी स्थिति ऐसी ही है, यदि कोई राष्ट्र और धर्मके लिए कुछ विशेष प्रयत्न करता है तो अनेक व्यक्ति उनके समक्ष अपनी अलंकृत भाषामें उनकी भूरी-भ्रूरी प्रशंसा करते हैं; परंतु कार्यमें योगदान देने हेतु कुछ भी प्रयास नहीं करते। ऐसे लोगोंकी प्रशंसासे राष्ट्र और धर्मका उत्थान होगा क्या या उनपर ईश्वरकी कृपा होगी क्या, स्वयं सोचें !! खरे कर्मयोगियोंको किसी भी प्रकारकी दिखावटी स्तुति और कोरे प्रोत्साहनकी आवश्यता नहीं होती !! यदि प्रत्येक हिन्दु, मात्र अपना एक घंटा राष्ट्र निर्माण और धर्म उत्थान हेतु देते हुए अपने बुद्धि, कौशल्य, धन और शरीरके माध्यमसे प्रयत्न करे तो इस देशको पुनः सोनेकी चिडिया बननेमें समय लगेगा क्या !! अतः कर्मनिष्ठ हिन्दु बनें, मैं धर्म और राष्ट्र उत्थान रूपी यज्ञमें क्या अर्पण कर सकता हूं इसका विचार कर कृतिशील हों !-तनुजा ठाकुर
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