भारतीय राजनीति अपनी अधोगतिकी परिसीमाको प्राप्त हो चुकी है । आजके नेताओंके वक्तव्य हमें बताते हैं कि उनकी मानसिकता कैसी हो चुकी है ? एक दूसरेमें दोष ढूंढना, अपनी चूकोंको स्वीकार नकर उसका दोषारोपण दूसरोंपर करना, विपक्षी नेताओंके वैयक्तिक जीवनसे सम्बन्धित प्रसंगोंको लेकर अनर्गल बातें करना, एक दूसरेको नीचा दिखाना, राष्ट्र हित छोडकर अपने दल, जाति, प्रान्त इत्यादिके विषयको लेकर बातें करना, यह सब अब राजनीतिका अविभाज्य अंग बन चुकी है । स्वस्थ राजनीतिका पुनर्जन्म हो, इस हेतु अब मात्र एक ही पर्याय है और वह है हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करना !
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