हिन्दू बहुल देशमें आए दिन कहीं न कहीं साम्प्रदायिक उत्पात (दंगे) होते ही रहते हैं । यदि हम इन उत्पातोंपर ध्यान देंगे तो यह स्पष्ट रूपसे दिखाई देगा कि यह बहुसंख्यक हिन्दुओंद्वारा अल्पसंख्यकोंंपर आक्रमण नहीं होता, अपितु धर्मान्धोंद्वारा कोई न कोई बहाना बनाकर, किसी भी घटनाको हिंसाका रूप देकर आतंक फैलाना ही इनका मूल उद्देश्य होता है । वस्तुत: हिन्दुओंको भयभीत करना, उनके मन्दिरोंकी प्रतिमाओंंको (मूर्तियोंको) खण्डित करना या हिन्दुओंंकी शोभायात्राओंमें पथराव करना, उनकी स्त्रियोंके साथ छेडछाड करना जैसी घटनाएं सम्पूर्ण भारतमें होती ही रहती हैं और हिन्दू यदि प्रतिकार करे तो उसे साम्प्रदायिक उत्पातकी संज्ञा दे दी जाती है ! धर्मान्धोंकी मस्जिदें, इन उपद्रवोंके प्रशिक्षण केन्द्र हैं, अब तो यह बात मुसलमान बुद्धिजीवी भी खुलकर कहने लगे हैं !
जिस देशमें २ % मत अधिक पानेके लिए नेतागण किसी भी प्रकारका धर्मद्रोह, राष्ट्रद्रोह करनेसे नहीं चूकते हैं, ऐसेमें अहिन्दुओंके तुष्टिकरणके आधारपर धर्मनिरपेक्ष सत्ता वर्षोंसे फली-फूली राजनीतिमें यह अपेक्षा करना कि आतंकका मूल (जड) मस्जिदोंको प्रतिबन्धित किया जाएगा, यह तो इस तथाकथित धर्मनिरपेक्ष व्यवस्थामें कभी सम्भव ही नहीं हो सकता है और यदि यह शीघ्र नहीं हुआ तो यह देश हिन्दुओंके लिए रहने योग्य नहीं रहेगा ! इस हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना शीघ्र करना ही एकमात्र पर्याय है !
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