आजका हिन्दू योग्य प्रकारसे साधना एवं धर्माचरण नहीं करता है, परिणामस्वरुप उसके जीवनमें कष्ट आनेपर वह सर्वप्रथम बुद्धिसे स्वयं उसके उपाय ढूंढता है, उसके पश्चात वह आधुनिक विज्ञानकी शरणमें जाता है और जब वह निराश हो जाता है तो धर्मकी शरणमें आता है, यदि वह पहले ही ऐसा करें तो उसे इतनी ठोकरें न खानी पडे ! ऐसा हो, इस हेतु बाल्यकालसे ही धर्मका महत्त्व उसके जीवनमें अंकित करना अति आवश्यक है और यह निधर्मी लोकतन्त्रमें कदापि सम्भव नहीं, इस हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करना अति आवश्यक है !
Leave a Reply