राजधर्म धर्मका अविभाज्य अंग है परंतु एकांगी साधना करनेवाले कहते हैं कि धर्म और राजनीतिका अस्तित्त्व भिन्न है। सत्य यह है कि सृष्टिके निर्माण के पश्चात ईश्वरने सर्वप्रथम राजधर्मके सिद्धान्त प्रतिपादित किए। पुरातन कालमें समाज सुखी इसलिए था क्योंकि राजा धर्मका पालन अपने सद्गुरु अर्थात धर्मके आधारपर करते थे – तनुजा ठाकुर
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