हिन्दुओं ! युवाशक्तिको राष्ट्र एवं धर्मके कार्यमें आगे आने हेतु प्रोत्साहित करें !!!


धर्म प्रसारके मध्य मैंने पाया है कि कुछ हिन्दू माता पिता स्वयं साधना करनेका प्रयास तो अवश्य करते हैं; परन्तु अपने संतानको इससे दूर ही रखते हैं उन्हें लगता है कि कहीं वे पूर्ण समय साधना करनेका निर्णय न ले लें ! यही हिन्दू धर्मकी विडम्बना है, एक ईसाईका कोई सम्बन्धी पादरी या नन बन जाए तो वह गर्वसे सबको यह बात बताता है, एक मुसलमानका कोई सम्बन्धी मौलवी बन जाए तो वह भी स्वयंको गौरवान्वित अनुभव करता है, उनका धर्मप्रेमतो इस सीमा तक ही कि कई इस्लामिक राष्ट्रोंमें वे अपने अल्पायु बालकोंको जेहादी बनाने हेतु आंतंकवादीके हाथों सहर्ष सौंप देते हैं; परन्तु एक हिन्दूके घर यदि कोई युवा या युवती साधना करने लगे और राष्ट्र और धर्मके कार्य हेतु पूर्ण समय देनेका निर्णय ले ले तो घरके सभी सदस्य असुरक्षित हो जाते हैं और उन्हें अपने युवा सदस्यके इस निर्णयपर क्षोभ और लज्जा आती है, और सभी मिलकर उसके मार्गमं  या तो अडचन निर्माण करते हैं या उसे सदैव हतोत्साहित करते रहते हैं विशेषकर माता –पिता तो स्वयंको अत्यधिक असुरक्षित अनुभव करने लगते हैं।

चिकित्सक (डॉक्टर), इंजिनियर, शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी, क्रिकेट-खिलाडी, राजनेता, अभिनेता इत्यादि तो आज प्रत्येक गलीके माता-पिता पैदा करते हैं; अतः यदि आपकी संतान ऐसा कर रही है तो इसमें बडप्पन कैसा ? आज हिन्दुओंकी इसी स्वार्थी प्रवृत्तिने भारत जैसी साधना भूमिको भोगवादी बनाकर आसुरी प्रवृत्तियोंको आगमें घी डालनेका कार्य किया है !

यदि आप किसी ऐसे जीवको जन्म दें जो स्वयंके उद्धारके साथ समाज और धर्मके उत्त्थान हेतु कार्य करे तो माताएं यह समाज लें कि आपकी कोख धन्य हो गई और पिता यह जाने लें कि खरे अर्थमें आपने कुलके उद्धार हेतु कुलदीपकको जन्म दिया है !

इतिहास साक्षी है राष्ट्र एवं धर्मके उत्थान हेतु समर्पित संतों, भक्तों और सन्यासियोंके माता-पिताका गुणगान इस सृष्टिमें चिरंतन काल तक किया जाता रहा है; परन्तु इस तथ्यसे अनभिज्ञ आजके हिन्दू क्षणिक सुख, यश और स्वार्थपूर्ति हेतु स्वय भी लिप्त रहते हैं और अपनी संतानोंको भी यही सिखाते हैं। ऐसे हिन्दू स्वामी विवेकानन्दका चित्र अपने घरमें अवश्य लगाकर रखते हैं; परन्तु स्वामीजी जैसे धर्मवीर उन्हें अपने घरमें नहीं अपितु अपने पडोसीके घरमें चाहिए होता है, यह आजके कालकी सबसे बडी विडम्बना है !

यथार्थमें आज हिन्दुओंकी इसी संकुचित मनोवृत्तिके कारण हिन्दू धर्मकी सर्वत्र ग्लानि हुई है, किंचित सोचें ! यदि गुरु गोबिंद सिंहजीके आवाहनपर प्रत्येक हिन्दूने अपने घरके एक पुत्रको हिन्दू धर्म रक्षणार्थ उन्हें समर्पित नहीं किया होता तो क्या आज उत्तर भारतमें हिन्दुओंका अस्तित्त्व होता, उसीप्रकार स्वतंत्रता संग्राम हेतु यदि भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चन्द्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियोंने सर्वस्व न्यौछावर नहीं किया होता तो क्या हम स्वतंत्र भारतमें सांसें ले रहे होते !!

कालानुसार आज युवाशक्तिको संतोंके मार्गदर्शनमें राष्ट्र एवं धर्मके कार्यमें नेतृत्व कर समाज और राष्ट्रको योग्य दिशा देनेकी आवश्यकता है। यदि आपके कुटुंबके कोई भी युवाको राष्ट्र एवं धर्मके कार्यमें अपना योगदान देने हेतु अल्प मात्र भी इच्छा हो तो उन्हें प्रोत्साहित करें क्योंकि स्वार्थी युवाओंकी तो आज समाजमें भरमार है जो मात्र अपने जीविकोपार्जन अर्थात् कैरियर और या अपने कुटुंबके सुख-ऐश्वर्यकी चिंता करते हैं, यदि राष्ट्र एवं धर्म हेतु कार्य करनेवाले जीवका आपके घरमें जन्म हुआ है, तो उनका तिलक कर आरती उतार उन्हें उस कार्यमें समर्पित करें, इसे अपना सौभाग्य मानें, तभी राष्ट्र और धर्मका उत्त्थान संभव होगा और भारत पुनः विश्वगुरु बनेगा और एक विशेष तथ्यका ध्यान रहे, आनेवाले काल अर्थात् ख्रीस्ताब्द २०२५ के पश्चात् जब हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना हो जाएगी तब सभी प्रकारके सामाजिक और राजनीतिक उच्च पद, साधना, त्याग और व्यक्तिके राष्ट्र और धर्मके उत्त्थानके कार्य अनुरूप दिया जाएगा, आपका पुत्र या पुत्री आजके आसुरी मैकाले शिक्षण पद्धतिमें कितना उच्च शिक्षण प्राप्त किया है इसका निकट भविष्यमें कोई महत्त्व नहीं होगा; अतः समय रहते अपनी अगली पीढीको योग्य दिशा देकर अपने धर्मकर्त्तव्यका निर्वाह कर, ईश्वरीय कृपाके पात्र बनें, विश्वास करें इतिहास आपके इस निर्णयका सदैव ऋणी रहकर आपका यशगान करेगा -तनुजा ठाकुर



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